🪔 योगिनी एकादशी व्रत कथा 🪔
1️⃣ मंगलाचरण 🙏✨
🙏 “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।” 🙏
2️⃣ परिचय 📖🌼
शास्त्रों में इसे “पाप विनाशिनी एकादशी” भी कहा गया है।
3️⃣ शास्त्रीय आधार 📜✨
योगिनी एकादशी का वर्णन मुख्यतः इन ग्रंथों में मिलता है —
शास्त्रों के अनुसार —
👉 योगिनी एकादशी का व्रत करने से:
- हजार गौदान के बराबर पुण्य
- समस्त जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट
- वैकुण्ठ लोक की प्राप्तिहोती है।
📖 पद्म पुराण में कहा गया है —
“योगिनी व्रतं कृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।”
अर्थात — योगिनी एकादशी व्रत करने वाला सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
4️⃣ पूजा विधि 🪔🌺
🌞 प्रातःकाल विधि
🛕 संकल्प विधि
जल लेकर हाथ में रखें और कहें —
“मम सर्वपापक्षयपूर्वक श्रीविष्णुप्रीत्यर्थंयोगिनी एकादशी व्रतं करिष्ये।”
फिर जल छोड़ दें।
🌼 पूजन सामग्री
🌸 पूजा क्रम
🌙 रात्रि जागरण
👉 संभव हो तो भजन, कीर्तन, जाप करें।
🌞 द्वादशी पारण
अगले दिन द्वादशी को ब्राह्मण/गरीब को दान देकर व्रत खोलें।
5️⃣ फल 🌟💫
योगिनी एकादशी व्रत से मिलने वाले फल —
👉 कहा जाता है कि यह व्रत सात जन्मों के पापों को नष्ट करता है।
6️⃣ नियम ⚖️📿
व्रत के दिन पालन करने योग्य नियम —
✅ करने योग्य
❌ वर्जित कर्म
🍽️ भोजन नियम
जिसमें सामर्थ्य हो, वैसा करें।
7️⃣🪔 योगिनी एकादशी व्रत कथा प्रारंभ 🪔
प्राचीन काल की बात है। हस्तिनापुर नगरी धर्म, सत्य और भक्ति का केंद्र मानी जाती थी। उसी नगरी में धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों और प्रजा सहित निवास करते थे। वे सदा श्रीकृष्ण के चरणों में लीन रहते थे और प्रत्येक व्रत, नियम तथा धर्म का पालन पूर्ण श्रद्धा से करते थे।
एक दिन प्रातःकाल जब सभा में विद्वान ब्राह्मण, मंत्री और भाई एकत्रित थे, तब युधिष्ठिर के मन में एक विशेष जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने विनम्र भाव से भगवान श्रीकृष्ण से कहा—
“हे माधव! आपने हमें अनेक व्रतों और उनके फलों के विषय में बताया है। कृपा करके यह भी बताइए कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी का क्या महत्व है? उसका नाम क्या है और उससे कौन-सा फल प्राप्त होता है?”
युधिष्ठिर की श्रद्धा और जिज्ञासा देखकर श्रीकृष्ण मंद मुस्कुराए। उनके मुख पर करुणा और प्रेम झलक रहा था। वे बोले—
“हे धर्मराज! जिस एकादशी के विषय में तुम जानना चाहते हो, उसका नाम योगिनी एकादशी है। यह अत्यंत पुण्यदायिनी है और पापों का नाश करने वाली है। इसके प्रभाव से मनुष्य भयंकर दुखों से मुक्त हो जाता है।”
फिर श्रीकृष्ण ने एक प्राचीन कथा सुनानी आरंभ की।
बहुत समय पहले अलकापुरी नाम की एक दिव्य नगरी थी। यह नगरी कुबेर की राजधानी थी। चारों ओर सुंदर उद्यान, बहती नदियाँ, पुष्पों की सुगंध, दिव्य भवन और स्वर्ण जटित महल थे। वहाँ देवताओं, यक्षों और गंधर्वों का वास था।
कुबेर देव धन के स्वामी थे और भगवान शिव के परम भक्त भी थे। वे प्रतिदिन नियमपूर्वक शिव पूजन करते थे। उनके महल में सदा भक्ति, शांति और अनुशासन का वातावरण रहता था।
कुबेर के सेवकों में एक अत्यंत सुंदर यक्ष था। उसका नाम था हेममाली। वह पुष्पों का संग्रह कर शिव पूजन हेतु लाने का कार्य करता था। प्रतिदिन प्रातःकाल वह नंदनवन जाता, वहाँ से ताजे फूल चुनकर लाता और कुबेर को सौंपता।
हेममाली का रूप अत्यंत आकर्षक था। उसका शरीर कांतिमय था, नेत्र कमल समान थे और स्वर मधुर था। परंतु उसके मन में एक विशेष आकर्षण था—वह था उसकी पत्नी विश्वावसु।
विश्वावसु अप्सरा तुल्य सुंदर स्त्री थी। उसका सौंदर्य देखकर देवता भी मोहित हो जाते थे। वह नृत्य, संगीत और प्रेमभाव में निपुण थी।
हेममाली अपनी पत्नी से अत्यंत प्रेम करता था। जब भी उसे अवसर मिलता, वह कुबेर की सेवा छोड़कर उसके साथ समय बिताना चाहता था।
एक दिन की बात है।
उस दिन भी कुबेर को शिव पूजन के लिए पुष्पों की आवश्यकता थी। परंतु उस दिन हेममाली का मन अपनी पत्नी के साथ रहने में लगा हुआ था। वह नंदनवन तो गया, परंतु पुष्प एकत्र करने के स्थान पर वह विश्वावसु के साथ विहार करने लगा।
वे दोनों वन में संगीत, नृत्य और प्रेम में इतने मग्न हो गए कि समय का भान ही नहीं रहा।
उधर कुबेर अपने महल में शिव पूजन की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने देखा कि समय बीत रहा है, परंतु हेममाली अभी तक पुष्प लेकर नहीं आया।
कुबेर को चिंता हुई। उन्होंने सेवकों से पूछा—
“हेममाली अभी तक क्यों नहीं आया?”
किसी के पास उत्तर नहीं था।
कुछ समय बाद हेममाली देर से पुष्प लेकर पहुँचा। उसके चेहरे पर अभी भी प्रेम का भाव झलक रहा था। उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त थे और मन एकाग्र नहीं था।
कुबेर ने यह सब देखकर समझ लिया कि वह अपने कर्तव्य से विमुख हुआ है।
क्रोधित होकर कुबेर बोले—
“हे दुष्ट! तूने अपने स्वार्थ और सुख के लिए मेरे आदेश की अवहेलना की। मेरी सेवा छोड़कर तू विषय-विलास में लीन रहा। तू शिवभक्ति का अपमानी है।”
कुबेर का क्रोध भयानक था। उनकी आँखें लाल हो गईं।
उन्होंने शाप देते हुए कहा—
“आज से तू कोढ़ी बनकर पृथ्वी पर भटकता रहेगा। तेरा सुंदर शरीर नष्ट हो जाएगा। तुझ पर भयंकर रोग चढ़ेगा और तू दर-दर भटकेगा।”
शाप सुनते ही हेममाली काँप उठा। उसी क्षण उसका शरीर विकृत होने लगा। चमकता हुआ रूप नष्ट हो गया। शरीर पर घाव होने लगे। पीड़ा असहनीय हो गई।
वह भूमि पर गिर पड़ा और रोने लगा।
“हे स्वामी! मुझसे भारी अपराध हो गया। मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं आपका सेवक हूँ।”
परंतु कुबेर का शाप अटल था।
कुछ ही क्षणों में हेममाली यक्षलोक से पृथ्वी पर गिर पड़ा। वह एक भयानक रोगी बन चुका था। उसका शरीर सड़ने लगा था। लोग उसे देखकर दूर भागते थे।
भूख, प्यास, रोग और अपमान से पीड़ित होकर वह जंगलों, पर्वतों और नगरों में भटकने लगा।
उसकी पत्नी विश्वावसु भी दुखी थी, परंतु शाप के कारण वह सहायता नहीं कर सकती थी।
दिन बीतते गए। वर्ष बीत गए।
हेममाली ने अत्यंत कष्ट सहा। कभी उसे भोजन नहीं मिलता, कभी पीड़ा से तड़पता रहता। उसके मन में केवल एक ही विचार था—
“मैंने अपने कर्तव्य से विमुख होकर यह सब भोगा है। यह मेरे कर्मों का फल है।”
एक दिन भटकते-भटकते वह बदरिकाश्रम के निकट पहुँचा। वहाँ महान तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि निवास करते थे।
वह आश्रम के समीप पहुँचा तो उसे शांति का अनुभव हुआ। वहाँ वातावरण में भक्ति और तपस्या की सुगंध थी।
किसी प्रकार वह घिसटते हुए आश्रम के भीतर गया और ऋषि के चरणों में गिर पड़ा।
आँखों से आँसू बहाते हुए बोला—
“हे महर्षि! मैं अत्यंत पापी हूँ। अपने कर्तव्य से गिरकर मैंने यह अवस्था पाई है। कृपा करके मुझे उद्धार का मार्ग बताइए।”
मार्कण्डेय ऋषि करुणामय थे। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से उसका संपूर्ण वृत्तांत जान लिया।
वे बोले—
“हे हेममाली! तूने अपने स्वामी और भगवान शिव का अपमान किया। इसलिए यह दंड मिला। परंतु यदि तू सच्चे मन से पश्चाताप करे, तो मुक्ति संभव है।”
हेममाली ने हाथ जोड़कर कहा—
“मुझे कोई भी मार्ग बताइए। मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ।”
ऋषि बोले—
“आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में योगिनी एकादशी आती है। यदि तू श्रद्धा से उसका पालन करेगा, तो तेरा समस्त पाप नष्ट होगा और शाप से मुक्ति मिलेगी।”
हेममाली को जैसे जीवन का नया प्रकाश मिल गया।
उसने मन में दृढ़ निश्चय किया कि वह पूरी श्रद्धा से इस एकादशी का पालन करेगा।
समय आने पर योगिनी एकादशी आई।
उस दिन हेममाली ने सच्चे मन से भगवान विष्णु का स्मरण किया। उसने अपने हृदय से अहंकार, लोभ और वासना का त्याग किया।
पूरे दिन वह भगवान के नाम का जप करता रहा।
“नारायण… नारायण… नारायण…”
उसकी आँखों से आँसू बहते रहे। वह अपने अपराधों को स्मरण कर पश्चाताप करता रहा।
रात्रि में भी उसने विश्राम नहीं किया और भक्ति में लीन रहा।
जब द्वादशी की सुबह हुई, तब आकाश से दिव्य प्रकाश उतरा।
एक दिव्य विमान प्रकट हुआ।
उसमें से विष्णुदूत उतरे।
उन्होंने हेममाली से कहा—
“हे पुण्यात्मा! तेरे व्रत और भक्ति से भगवान प्रसन्न हुए हैं। तेरा शाप नष्ट हो चुका है।”
क्षणभर में हेममाली का रोग समाप्त हो गया। उसका शरीर पुनः दिव्य, सुंदर और तेजस्वी हो गया।
वह प्रसन्न होकर रोने लगा।
“हे प्रभु! आपकी कृपा से मैं पुनः जीवित हुआ।”
विष्णुदूत उसे विमान में बैठाकर स्वर्गलोक ले गए।
वह पुनः अलकापुरी पहुँचा।
कुबेर ने उसे देखकर कहा—
“अब तू शुद्ध हो चुका है। मेरी सेवा में पुनः लग जा।”
हेममाली ने जीवन भर भक्ति और कर्तव्य का पालन किया।
श्रीकृष्ण यह कथा सुनाकर युधिष्ठिर से बोले—
“हे राजन! योगिनी एकादशी का ऐसा प्रभाव है कि वह सबसे बड़े पापी को भी मुक्त कर देती है। जो श्रद्धा से इसका पालन करता है, वह इस लोक और परलोक में सुख पाता है।”
युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा—
“हे प्रभु! आपने मुझे महान रहस्य बताया। मैं जीवन भर इसका सम्मान करूँगा।”
इस प्रकार योगिनी एकादशी की यह पवित्र कथा समाप्त होती है।
8️⃣ समापन 🌼🙏
🌸 अंत में प्रार्थना करें —
“हे श्रीहरि!मेरी भूलों को क्षमा करें।यह व्रत आपकी कृपा से पूर्ण हुआ।मुझ पर सदा अपनी कृपा बनाए रखें।” 🙏
