🪔 परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा 🪔
1️⃣ 🕉️ मंगलाचरण
2️⃣ 📖 परिचय
परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है।
👉 इसे जलझूलनी एकादशी और पद्मा एकादशी भी कहा जाता है।
इस दिन भगवान विष्णु चार माह के योगनिद्रा काल में करवट लेते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी कहा जाता है।
🌺 विशेषता:
- चातुर्मास का मध्य काल
- विष्णु भक्ति का श्रेष्ठ दिन
- वैष्णव परंपरा में अत्यंत पवित्र
इस दिन व्रत रखने से जीवन में स्थिरता, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। 🕊️✨
3️⃣ 📜 शास्त्रीय आधार
परिवर्तिनी एकादशी का उल्लेख अनेक धर्मग्रंथों में मिलता है:
📚 प्रमुख ग्रंथ:
- पद्म पुराण
- स्कंद पुराण
- ब्रह्मवैवर्त पुराण
- विष्णु धर्मोत्तर पुराण
शास्त्रों के अनुसार:
👉 यह एकादशी पापों का नाश और मोक्ष का द्वार खोलने वाली मानी गई है।
भगवान स्वयं कहते हैं कि यह व्रत करने वाला व्यक्ति मेरे अत्यंत प्रिय बन जाता है। 💛📿
4️⃣ 🪔 पूजा विधि
🌼 प्रातःकाल
🌺 पूजन सामग्री
- पीले फूल
- तुलसी पत्र
- धूप
- दीप
- फल
- पंचामृत
- नैवेद्य
🌸 पूजा विधि
📿 मुख्य मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
कम से कम 108 बार जप करें।
🌙 रात्रि
- भजन
- कीर्तन
- हरि नाम स्मरण
करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ✨🎶
5️⃣ 🌟 फल
परिवर्तिनी एकादशी व्रत से निम्न फल प्राप्त होते हैं:
6️⃣ 📜 नियम
व्रत को सफल बनाने हेतु निम्न नियमों का पालन करें:
🚫 वर्जित कार्य
✅ करने योग्य
🍽️ भोजन नियम
- निर्जल व्रत सर्वोत्तम
- फलाहार मध्यम
- एक समय भोजन न्यूनतम
👉 अगले दिन द्वादशी को पारण करें। 🌸
7️⃣🪔 परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा प्रारंभ 🪔
बहुत प्राचीन काल की बात है। जब सृष्टि अभी अपनी युवावस्था में थी, तब देवता और असुरों के बीच निरंतर युद्ध हुआ करते थे। कभी देवता जीतते, कभी असुरों का पलड़ा भारी हो जाता। उन दिनों असुरों का राजा बलि अत्यंत पराक्रमी, दानवीर और सत्यप्रिय था। यद्यपि वह असुर कुल में जन्मा था, फिर भी उसके भीतर महान गुण थे। वह ब्राह्मणों का सम्मान करता, दान देता, व्रत करता और सदा सत्य के मार्ग पर चलता था।
बलि महाराज के दान और तपस्या की ख्याति तीनों लोकों में फैल चुकी थी। पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल — तीनों लोकों में उसका शासन फैल गया था। उसके यज्ञों और दानों से ब्राह्मण संतुष्ट थे, प्रजा सुखी थी, और कोई भी दुखी नहीं था। वह प्रजा को अपने पुत्रों के समान मानता था। उसके राज्य में अन्याय, अत्याचार और असत्य का नाम भी नहीं था।
उसकी भक्ति और तपस्या से भगवान विष्णु भी अत्यंत प्रसन्न थे। बलि महाराज भगवान को ही अपना आराध्य मानते थे। वे प्रतिदिन उनका ध्यान करते, उनके नाम का स्मरण करते और अपने समस्त कर्म भगवान को समर्पित करते थे। यद्यपि वह असुर कुल का राजा था, फिर भी उसका हृदय पूर्णतः भक्तिमय था।
परंतु जब बलि महाराज ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया, तब देवताओं का स्वर्ग छिन गया। इंद्र और अन्य देवता अपने स्थान से गिर गए। वे सभी दुखी होकर ब्रह्मा जी के पास गए और अपनी व्यथा सुनाई। फिर ब्रह्मा जी उन्हें लेकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे।
देवताओं ने भगवान से प्रार्थना की, “हे प्रभु! बलि अत्यंत शक्तिशाली हो गया है। उसने हमसे स्वर्ग छीन लिया है। हम आपकी शरण में हैं। कृपा करके हमें हमारा अधिकार वापस दिलाइए।”
भगवान विष्णु मुस्कराए। उन्होंने कहा, “हे देवताओं, बलि मेरा परम भक्त है। मैं उससे युद्ध नहीं कर सकता। परंतु मैं उसे एक लीला के माध्यम से उसका स्थान दिखाऊंगा।”
यह कहकर भगवान ने वामन रूप धारण करने का निश्चय किया। उन्होंने एक छोटे ब्राह्मण बालक का रूप लिया। सिर पर जटा, हाथ में कमंडलु, शरीर पर वल्कल वस्त्र, और मुख पर तेजस्वी आभा। वह रूप देखकर स्वयं ब्रह्मा, शंकर और देवता भी चकित रह गए।
उसी समय बलि महाराज एक विशाल यज्ञ कर रहे थे। चारों ओर वेद मंत्र गूंज रहे थे। ब्राह्मणों को दान दिया जा रहा था। स्वर्ण, रत्न, वस्त्र, गाय, भूमि — सब कुछ मुक्त भाव से बांटा जा रहा था। बलि महाराज का नियम था कि जो भी याचक द्वार पर आए, वह खाली हाथ न लौटे।
तभी भगवान वामन उस यज्ञशाला में पहुंचे। उनका तेज इतना अद्भुत था कि सभी लोग उन्हें देखकर मोहित हो गए। बलि महाराज स्वयं उठकर उनका स्वागत करने आए। उन्होंने वामन को आदरपूर्वक आसन दिया और कहा, “हे ब्राह्मणदेव! आप धन्य हैं जो मेरे यज्ञ में पधारे। जो कुछ भी आप चाहें, मुझसे मांग लें।”
वामन भगवान ने मधुर स्वर में कहा, “हे राजन! मुझे अधिक कुछ नहीं चाहिए। बस तीन पग भूमि दे दीजिए।”
बलि महाराज मुस्कराए। उन्होंने कहा, “हे बालक! तुम बहुत अल्प मांग रहे हो। मैं तुम्हें पूरे द्वीप, नगर, ग्राम, स्वर्ण, रत्न दे सकता हूं। केवल तीन पग भूमि क्यों?”
वामन बोले, “जो मुझे चाहिए, वही पर्याप्त है।”
बलि महाराज दान देने को तत्पर थे। परंतु उनके गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है। उन्होंने बलि से कहा, “राजन! यह स्वयं विष्णु हैं। तुम्हें छलने आए हैं। यह दान मत दो।”
बलि महाराज ने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव! यदि स्वयं भगवान मुझसे याचना करें, तो मैं कैसे मना कर सकता हूं? दान देकर यदि सब कुछ चला भी जाए, तो भी मुझे संतोष रहेगा। सत्य और दान से बढ़कर कुछ नहीं।”
यह कहकर उन्होंने जल लेकर संकल्प किया और तीन पग भूमि दान करने का वचन दिया।
जैसे ही संकल्प पूरा हुआ, वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर लिया। उनका शरीर आकाश से भी ऊंचा हो गया। पहले पग में उन्होंने पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में पूरा स्वर्ग और आकाश नाप लिया।
अब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा।
भगवान ने बलि की ओर देखा और कहा, “हे राजन! अब तीसरा पग कहां रखूं?”
बलि महाराज तुरंत भूमि पर लेट गए। उन्होंने अपना सिर आगे कर दिया और बोले, “प्रभु! मेरा सिर ही तीसरे पग के लिए स्थान है।”
भगवान विष्णु भावविभोर हो गए। उन्होंने अपना चरण बलि के सिर पर रखा। उसी क्षण बलि पाताल लोक में चले गए।
परंतु भगवान ने उन्हें दंड नहीं दिया, बल्कि वरदान दिया। उन्होंने कहा, “हे बलि! तुम्हारी भक्ति, दान और सत्य से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम पाताल लोक के राजा रहोगे। मैं स्वयं तुम्हारा द्वारपाल बनकर रहूंगा।”
यह सुनकर बलि की आंखों से आंसू बहने लगे। वह बोले, “प्रभु! आपने मुझ पर अपार कृपा की है।”
भगवान विष्णु पाताल लोक में जाकर बलि के द्वार पर निवास करने लगे। लक्ष्मी जी वैकुंठ में अकेली रह गईं। उन्हें अपने स्वामी की बहुत चिंता हुई। वे दिन-रात भगवान का स्मरण करने लगीं।
एक दिन लक्ष्मी जी ने विचार किया कि उन्हें स्वयं पाताल लोक जाकर भगवान को वापस लाना होगा। उन्होंने एक साधारण स्त्री का रूप धारण किया और पाताल लोक पहुंच गईं।
वहां उन्होंने बलि महाराज से कहा, “राजन! मैं आपकी बहन बनना चाहती हूं। क्या आप मुझे स्वीकार करेंगे?”
बलि महाराज अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने कहा, “बहन! मैं धन्य हो गया। आज से तुम मेरी बहन हो।”
लक्ष्मी जी ने प्रेमपूर्वक उनके हाथ में रक्षा सूत्र बांधा और कहा, “भैया! मैं आपकी रक्षा की कामना करती हूं।”
बलि महाराज ने उन्हें वचन दिया कि वे जीवन भर उनकी रक्षा करेंगे और उनकी हर इच्छा पूरी करेंगे।
फिर लक्ष्मी जी ने कहा, “भैया! मुझे अपने स्वामी भगवान विष्णु की बहुत याद आती है। क्या आप उन्हें मेरे साथ भेज सकते हैं?”
बलि महाराज असमंजस में पड़ गए। भगवान स्वयं उनके द्वारपाल थे। परंतु उन्होंने बहन को दिया हुआ वचन याद किया। सत्यप्रिय बलि ने कहा, “बहन! मैं अपना वचन नहीं तोड़ सकता। तुम भगवान को अपने साथ ले जाओ।”
भगवान विष्णु यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को गले लगाया और कहा, “हे भक्तश्रेष्ठ! तुम सदा मेरे प्रिय रहोगे।”
भगवान लक्ष्मी जी के साथ वैकुंठ लौट आए।
जाते समय भगवान ने बलि को वरदान दिया कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को जो मनुष्य व्रत करेगा और इस कथा का श्रद्धा से स्मरण करेगा, उसे वही पुण्य प्राप्त होगा जो महान यज्ञों और दानों से मिलता है।
यह एकादशी “परिवर्तिनी” कहलाने लगी, क्योंकि इसी दिन भगवान ने अपना स्थान बदला था — पाताल से वैकुंठ की ओर।
कहा जाता है कि इस दिन कथा का श्रवण करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं, जीवन में संकट दूर होते हैं, और अंत में वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
बलि महाराज आज भी पाताल लोक में भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं। भगवान विष्णु आज भी उन्हें अपना प्रिय भक्त मानते हैं। उनकी सत्यनिष्ठा, दानशीलता और भक्ति संसार के लिए आदर्श बन गई।
जो भी मनुष्य श्रद्धा, विश्वास और पवित्र मन से इस कथा का स्मरण करता है, उसके जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थ सहज ही प्राप्त होते हैं।
आपकी कृपा से हमारा जीवन धर्ममय, शांतिपूर्ण और सफल बने।
हमेशा आपकी भक्ति हमारे हृदय में बनी रहे। 🌼✨
