🏠 मुख्यपृष्ठ 🌤️ आज का पंचांग 🔮 आज का राशिफल 👦 आज जन्मे बच्चों का नामाक्षर 🕉️ संपूर्ण व्रत कथा ▾
🛕 साप्ताहिक व्रत कथा 🪔 एकादशी व्रत कथा 🌺 देवी व्रत कथा 🔱 भगवान आधारित व्रत 🌕 पूर्णिमा / अमावस्या व्रत कथा 👩 स्त्रियों के प्रमुख व्रत 🎉 पर्व आधारित व्रत 📿 विशेष / दुर्लभ व्रत
💬 संपर्क करें

कामदा एकादशी व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व | Kamada Ekadashi Vrat Katha Hindi

🪔 कामदा एकादशी व्रत कथा 🪔


1️⃣ मंगलाचरण 🙏🕉️

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ नमः श्रीमन नारायणाय।
ॐ नमः श्री लक्ष्मीपति विष्णवे नमः।

हे करुणानिधान श्रीहरि विष्णु!
आपकी कृपा से यह कामदा एकादशी व्रत श्रद्धा, भक्ति और नियमपूर्वक संपन्न हो,
हमारे समस्त पापों का नाश हो तथा जीवन में सुख-शांति और मोक्ष की प्राप्ति हो।

🙏 सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। 🙏


2️⃣ परिचय 🌺📖

कामदा एकादशी हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है।
यह एकादशी भगवान श्री विष्णु को समर्पित होती है।

👉 “कामदा” शब्द का अर्थ है —
मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली।

इस व्रत को करने से:
✔️ पापों का नाश
✔️ पुण्य की प्राप्ति
✔️ मनोकामनाओं की पूर्ति
✔️ वैवाहिक सुख
✔️ संतान सुख
✔️ आध्यात्मिक उन्नति
प्राप्त होती है।

यह एकादशी विशेष रूप से गृहस्थ जीवन, मानसिक शांति और भक्ति मार्ग के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। 🌸✨


कामदा एकादशी व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व | Kamada Ekadashi Vrat Katha Hindi

3️⃣ शास्त्रीय आधार 📜🕯️

कामदा एकादशी का वर्णन मुख्य रूप से निम्न ग्रंथों में मिलता है—

📖 पद्म पुराण
📖 ब्रह्मवैवर्त पुराण
📖 भविष्य पुराण
📖 विष्णु पुराण

पद्म पुराण के अनुसार:

“सर्वपापप्रशमनी कामदा नाम विश्रुता।”

अर्थात —
कामदा एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है।

शास्त्रों में कहा गया है कि:
जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।

यह व्रत ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या, भ्रूणहत्या जैसे महापापों से भी मुक्ति दिलाने वाला बताया गया है। ⚖️🕊️


4️⃣ पूजा विधि 🪔🌼

🌅 प्रातःकालीन तैयारी

✔️ ब्रह्ममुहूर्त में उठें
✔️ स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
✔️ घर व पूजा स्थान की सफाई करें
✔️ मन को शुद्ध रखें


🛕 पूजा स्थान की व्यवस्था

  • चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएँ
  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
  • लक्ष्मी जी का भी चित्र रखें

🌸 पूजन सामग्री

✔️ जल कलश
✔️ पंचामृत
✔️ तुलसी दल
✔️ पुष्प
✔️ धूप
✔️ दीप
✔️ नैवेद्य (फल, मिष्ठान)
✔️ अक्षत
✔️ चंदन


🙏 पूजन विधि क्रम

1️⃣ संकल्प लें —
"मैं अमुक व्यक्ति, अमुक गोत्र का, कामदा एकादशी व्रत कर रहा/रही हूँ।"

2️⃣ भगवान विष्णु का अभिषेक करें (जल/पंचामृत से)

3️⃣ वस्त्र व चंदन अर्पित करें

4️⃣ पुष्प व तुलसी अर्पित करें

5️⃣ धूप-दीप जलाएँ

6️⃣ नैवेद्य अर्पित करें

7️⃣ विष्णु सहस्रनाम / विष्णु मंत्र का जाप करें


📿 प्रमुख मंत्र

👉 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
👉 ॐ विष्णवे नमः
👉 श्रीमन नारायण नारायण हरि हरि

कम से कम 108 बार जप करें। 🕉️📿


🌙 रात्रि पूजन

  • रात्रि में जागरण करें
  • भजन-कीर्तन करें
  • विष्णु नाम स्मरण करें

5️⃣ फल 🌟🏵️

कामदा एकादशी व्रत से प्राप्त फल —

✅ जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट
✅ दरिद्रता दूर होती है
✅ परिवार में सुख-शांति
✅ रोगों से मुक्ति
✅ व्यापार व नौकरी में उन्नति
✅ वैवाहिक बाधा दूर
✅ मोक्ष की प्राप्ति

शास्त्रों में कहा गया है कि यह व्रत करने वाला व्यक्ति विष्णु लोक को प्राप्त करता है। 🌈✨


6️⃣ नियम 📜⚖️

कामदा एकादशी व्रत के मुख्य नियम —

🚫 वर्जित कार्य

❌ मांस-मदिरा सेवन
❌ झूठ बोलना
❌ क्रोध
❌ निंदा
❌ हिंसा
❌ बुरा विचार


✅ पालन करने योग्य नियम

✔️ ब्रह्मचर्य पालन
✔️ सत्य बोलना
✔️ दान करना
✔️ सेवा भाव
✔️ संयम
✔️ भक्ति


🍽️ भोजन नियम

👉 निर्जल व्रत (श्रेष्ठ)
👉 फलाहार (सामर्थ्य अनुसार)
👉 एक समय भोजन

दशमी को हल्का भोजन करें।
एकादशी को चावल बिल्कुल न खाएँ। 🍚🚫


7️⃣🪔कामदा एकादशी व्रत कथा प्रारंभ 🪔

बहुत प्राचीन समय की बात है। जब पृथ्वी पर धर्म, तप और भक्ति का प्रभाव अत्यंत प्रबल था, तब अनेक ऐसे राजा और राज्य थे, जहाँ लोग भगवान विष्णु की आराधना को ही जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य मानते थे। उन्हीं कालखंडों में एक अत्यंत सुंदर और समृद्ध नगरी थी, जिसका नाम था रत्नपुर। यह नगरी चारों ओर से पुष्पवनों, सरोवरों और पर्वतों से घिरी हुई थी। वहाँ के भवन रत्नों से जड़े हुए थे, सड़कों पर स्वर्ण की चमक दिखाई देती थी और नागरिक धर्मपरायण तथा सदाचारी थे।

इस रत्नपुर नगरी का राजा था पुण्डरीक। वह धर्मप्रिय, सत्यवादी, दयालु और भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसने अपने जीवन का प्रत्येक कार्य धर्म के अनुसार करने का संकल्प ले रखा था। प्रजा उससे अत्यंत प्रेम करती थी, क्योंकि वह कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करता था। उसके राज्य में चोरी, झूठ और छल-कपट लगभग समाप्त हो चुका था।

राजा पुण्डरीक के दरबार में अनेक विद्वान ब्राह्मण, ऋषि, मुनि और कलाकार रहते थे। उनमें से एक था गंधर्व ललित। ललित अत्यंत सुंदर स्वर वाला गायक था। जब वह वीणा लेकर गाता, तो ऐसा प्रतीत होता मानो स्वयं देवता उसके स्वर में उतर आए हों। उसकी आवाज़ में ऐसी मधुरता थी कि सुनने वाला सब कुछ भूल जाता।

ललित का विवाह एक अत्यंत सुंदर और गुणवान अप्सरा से हुआ था, जिसका नाम था ललिता। वह न केवल रूप में अनुपम थी, बल्कि स्वभाव से भी अत्यंत कोमल और पतिव्रता थी। वह अपने पति से अत्यधिक प्रेम करती थी और हर समय उसके सुख-दुःख में सहभागी रहती थी।

ललित और ललिता दोनों ही राजा पुण्डरीक के दरबार में सम्मानित थे। राजा उन्हें पुत्र समान मानता था।

एक दिन की बात है। राजा पुण्डरीक के दरबार में एक भव्य सभा आयोजित की गई थी। उस दिन देवताओं, गंधर्वों और किन्नरों के सम्मान में एक विशाल संगीत समारोह रखा गया था। स्वयं राजा भी उसमें उपस्थित था। दरबार में स्वर्णजड़ित स्तंभ, सुगंधित पुष्प, दीपों की रोशनी और मंत्रोच्चार से वातावरण अत्यंत पवित्र और भव्य हो गया था।

उस सभा में ललित को गायन का अवसर मिला। उसने अपनी वीणा उठाई और भगवान विष्णु की स्तुति में गान प्रारंभ किया। उसका स्वर इतना मधुर था कि स्वयं राजा ध्यानमग्न हो गया। देवताओं के प्रतिनिधि भी मंत्रमुग्ध हो गए।

परंतु उस समय ललित के मन में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई। उसका मन गान में न लगकर अपनी पत्नी ललिता की ओर चला गया। उसे अचानक उसकी याद आने लगी। वह सोचने लगा कि इस समय वह क्या कर रही होगी, क्या वह ठीक होगी, क्या उसे मेरी याद आ रही होगी।

यही सोचते-सोचते उसके स्वर में हल्की सी अशुद्धि आ गई। पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया, पर धीरे-धीरे उसका मन भटकने लगा और स्वर की शुद्धता बिगड़ती चली गई। लय टूटने लगी, ताल गड़बड़ा गया और भाव भी कम होने लगा।

राजा पुण्डरीक यह सब देख रहा था। उसे यह अत्यंत अनुचित लगा कि देवताओं के सम्मान में हो रहे इस पवित्र आयोजन में ललित ने अपने कर्तव्य से ध्यान हटा लिया। राजा को यह अपमान जैसा लगा।

राजा के हृदय में क्रोध उत्पन्न हुआ। वह धर्मप्रिय था, परंतु अनुशासन के मामले में कठोर भी था। उसने तुरंत ललित को रोक दिया और क्रोधित स्वर में कहा, “तुमने अपने कर्तव्य का अपमान किया है। दरबार में भगवान की स्तुति करते समय तुम्हारा मन संसारिक विषयों में भटक रहा था। यह घोर अपराध है।”

ललित भयभीत हो गया। वह राजा के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा माँगने लगा। उसने कहा, “महाराज, मुझसे भूल हो गई। कृपया क्षमा करें।”

परंतु राजा का क्रोध शांत नहीं हुआ। उसने कहा, “जो व्यक्ति ईश्वर की सेवा में लापरवाही करता है, वह दंड का अधिकारी है।”

इतना कहकर राजा ने अपने राजदंड से ललित को श्राप दे दिया, “हे ललित, तुमने अपने कर्तव्य से विमुख होकर अधर्म किया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूँ कि तुम एक भयानक राक्षस बन जाओ और जंगलों में भटकते रहो।”

राजा का श्राप सुनते ही ललित का शरीर कांपने लगा। देखते ही देखते उसका सुंदर रूप विकृत होने लगा। उसके हाथ-पैर बढ़ गए, आँखें लाल हो गईं, दाँत बाहर निकल आए और वह भयानक राक्षस में बदल गया।

कुछ ही क्षणों में वह भयावह रूप धारण कर जंगल की ओर भाग गया।

उधर, जब ललिता को यह समाचार मिला, तो वह शोक से व्याकुल हो गई। उसका हृदय टूट गया। जिस पति को वह प्राणों से अधिक प्रेम करती थी, वह अब राक्षस बन चुका था।

वह रोती-बिलखती हुई राजा पुण्डरीक के पास पहुँची। उसने राजा के चरणों में गिरकर विनती की, “महाराज, मेरे पति से अज्ञानवश भूल हो गई। कृपया अपना श्राप वापस ले लीजिए।”

राजा का हृदय द्रवित हो गया, परंतु उसने कहा, “हे ललिता, राजा का दिया हुआ श्राप वापस नहीं लिया जा सकता। परंतु यदि तुम्हारे पति को कोई पुण्य प्राप्त हो जाए, तो वह मुक्त हो सकता है।”

ललिता ने पूछा, “महाराज, ऐसा कौन-सा पुण्य है जिससे मेरे पति को मुक्ति मिले?”

राजा ने कहा, “चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहते हैं। यदि कोई व्यक्ति इस व्रत का विधिपूर्वक पालन करता है, तो वह बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट कर देता है।”

यह सुनकर ललिता के मन में आशा की किरण जागी।

वह तुरंत अपने पति को खोजने निकल पड़ी। वह जंगल-जंगल भटकती रही। कई दिनों बाद उसने एक घने वन में अपने पति को देखा। वह अब भी राक्षस के रूप में था, दुखी और पीड़ित।

ललिता उसे देखकर रो पड़ी। उसने साहस जुटाकर उससे बात की। उसने कहा, “स्वामी, मैं आपके लिए एक ऐसा व्रत करूँगी जिससे आपका उद्धार हो जाएगा।”

ललित ने करुण स्वर में कहा, “प्रिय, अब मेरे लिए कुछ नहीं बचा। मैं अपने कर्मों का फल भुगत रहा हूँ।”

परंतु ललिता ने हार नहीं मानी।

उसने कामदा एकादशी का व्रत पूरे श्रद्धा और विश्वास के साथ किया। उसने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, “हे प्रभु, मेरे पति की भूल को क्षमा कर दीजिए। उन्हें पुनः उनका स्वरूप प्रदान कीजिए।”

उसकी भक्ति, प्रेम और तपस्या इतनी सच्ची थी कि स्वयं भगवान विष्णु प्रसन्न हो गए।

व्रत के प्रभाव से ललित का राक्षसी शरीर धीरे-धीरे नष्ट होने लगा। उसके अंग पुनः सुंदर होने लगे। उसकी आँखों में करुणा लौट आई। कुछ ही समय में वह फिर से अपने पूर्व स्वरूप में आ गया।

जब वह पूर्णतः मानव रूप में आ गया, तो उसने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और ललिता को गले लगा लिया। दोनों की आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे।

वे दोनों राजा पुण्डरीक के पास गए और अपना अनुभव बताया। राजा यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने कहा, “यह कामदा एकादशी का ही प्रभाव है, जो असंभव को संभव कर देती है।”

उस दिन से राजा स्वयं भी इस व्रत को बड़ी श्रद्धा से मानने लगा और प्रजा को भी इसके महत्व का उपदेश देने लगा।

ललित और ललिता ने शेष जीवन भगवान विष्णु की भक्ति में बिताया। उन्होंने कभी अहंकार नहीं किया और हमेशा अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा।

इस प्रकार कामदा एकादशी की महिमा समस्त लोकों में फैल गई। लोग जान गए कि यह व्रत न केवल पापों का नाश करता है, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी विपत्तियों से भी रक्षा करता है।

और यही कारण है कि आज भी श्रद्धालु इस व्रत को बड़ी आस्था से करते हैं और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करते हैं।


8️⃣ समापन 🌺🙏

कामदा एकादशी व्रत श्रद्धा, नियम और भक्ति का संगम है।
यह केवल उपवास नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और ईश्वर से जुड़ने का माध्यम है।

जो व्यक्ति इस व्रत को नियमित करता है,
वह जीवन में कभी भी अभाव, दुःख और निराशा का अनुभव नहीं करता।

अंत में भगवान विष्णु से प्रार्थना करें—

🙏 हे प्रभु!
मेरी भक्ति स्वीकार करें,
मेरे दोष क्षमा करें,
और मुझे सद्मार्ग पर चलने की शक्ति दें। 🙏

✨ नारायण नारायण हरि हरि ✨