🪔 इंदिरा एकादशी व्रत कथा 🪔
1️⃣ 🕉️ मंगलाचरण
2️⃣ 📖 परिचय
3️⃣ 📜 शास्त्रीय आधार
इंदिरा एकादशी का वर्णन निम्न ग्रंथों में मिलता है—
शास्त्रों के अनुसार—
"इंदिरा एकादशी व्रत से पितृ लोक में स्थित आत्माएँ तृप्त होती हैं और मोक्ष प्राप्त करती हैं।" 🙏
📌 यह व्रत श्राद्ध के समान फल देने वाला माना गया है।
4️⃣ 🪔 पूजा विधि
🌙 एकादशी से एक दिन पूर्व (दशमी)
🌞 एकादशी के दिन
🌼 पूजन विधि
📿 जप व पाठ
का पाठ करें।
🌙 रात्रि जागरण
🌞 द्वादशी पारण
5️⃣ 🌟 व्रत का फल
इंदिरा एकादशी के मुख्य फल—
📌 यह व्रत हजार अश्वमेध यज्ञ के समान फल देता है।
6️⃣ 📌 व्रत के नियम
इंदिरा एकादशी में ये नियम अनिवार्य हैं—
🍽️ भोजन नियम
7️⃣🪔 इंदिरा एकादशी व्रत कथा प्रारंभ 🪔
बहुत प्राचीन समय की बात है। सातों द्वीपों से सुशोभित इस पृथ्वी पर एक महान और धर्मनिष्ठ राजा हुआ करता था, जिसका नाम था नरेश नृग। वह इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुआ था और सत्य, धर्म, दया तथा करुणा का साक्षात् स्वरूप माना जाता था। प्रजा उसे पिता की तरह मानती थी और वह भी प्रजा को अपने पुत्रों के समान प्रेम करता था। उसके राज्य में कोई भूखा नहीं सोता था, कोई अन्याय नहीं होता था, और कोई भी दुखी नहीं रहता था। मंदिरों में प्रतिदिन वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता था, ब्राह्मणों का सम्मान होता था और यज्ञ-हवन से वातावरण पवित्र रहता था।
राजा नृग स्वयं भी अत्यंत धार्मिक था। वह नियमित रूप से दान करता, ब्राह्मणों की सेवा करता, अतिथियों का सत्कार करता और भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था — धर्म के मार्ग पर चलते हुए प्रजा की रक्षा करना और भगवान की भक्ति में लीन रहना।
इसी राजा नृग का एक पुत्र था जिसका नाम था मान्धाता। मान्धाता भी अपने पिता की तरह ही धर्मात्मा, वीर, बुद्धिमान और सत्यनिष्ठ था। वह बचपन से ही वेद-शास्त्रों का अध्ययन करता था और संतों-महात्माओं की संगति में रहता था। जब वह युवावस्था में पहुँचा, तब राजा नृग ने उसे राज्य का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और स्वयं वन में तपस्या करने चले गए।
राजा मान्धाता के शासनकाल में राज्य और भी अधिक समृद्ध हो गया। चारों दिशाओं से लोग उसके न्याय और धर्म की प्रशंसा करते थे। देवता भी उसके यज्ञों से प्रसन्न रहते थे। कोई अकाल नहीं पड़ता था, वर्षा समय पर होती थी और धरती अन्न से भरपूर रहती थी।
एक बार की बात है, राजा मान्धाता अपने दरबार में बैठे थे। चारों ओर मंत्री, विद्वान ब्राह्मण, सेनापति और राजपुरोहित उपस्थित थे। तभी अचानक राजा के मन में एक गहरी उदासी छा गई। बिना किसी कारण के उनका हृदय भारी होने लगा। वे चिंतित हो उठे।
मंत्रियों ने बहुत विचार किया, पर किसी को कारण समझ में नहीं आया। तब राजा ने निश्चय किया कि वे स्वयं महर्षि नारद से मिलेंगे, क्योंकि नारद मुनि त्रिकालदर्शी थे और तीनों लोकों का भ्रमण करते थे।
राजा तुरंत अपने रथ पर सवार होकर उस वन की ओर चल पड़े जहाँ नारद मुनि तपस्या करते थे। अनेक दिनों की यात्रा के बाद वे उस पवित्र आश्रम में पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि नारद मुनि वीणा बजाते हुए भगवान विष्णु का स्मरण कर रहे हैं।
राजा ने श्रद्धा से उनके चरणों में प्रणाम किया।
नारद मुनि ने उन्हें उस व्रत का महात्म्य सुनाया और आशीर्वाद देकर विदा किया।
राजा मान्धाता वापस अपने नगर लौट आए। समय बीतता गया। आश्विन मास आ पहुँचा। कृष्ण पक्ष की एकादशी का दिन निकट आया। राजा ने पूरे मन, तन और आत्मा से भगवान विष्णु का स्मरण किया और व्रत का संकल्प लिया।
उस दिन राजा ने अपने मन को पूर्णतः संसारिक विषयों से हटा लिया। वे राजमहल छोड़कर एकांत में बैठ गए। न भोजन, न जल, न सुख-सुविधा — केवल भगवान विष्णु का ध्यान।
रात्रि में उन्होंने जागरण किया और निरंतर विष्णु सहस्रनाम का जप किया। उनके हृदय में केवल एक ही भावना थी — “मेरे पितरों का उद्धार हो।”
वह पूरी रात भक्ति में लीन रहे। जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनके शरीर की शक्ति क्षीण होती गई, पर मन और अधिक दृढ़ होता गया।
दूसरे दिन द्वादशी के प्रातःकाल जब सूर्य उदय हुआ, तब राजा ने भगवान विष्णु को प्रणाम किया और अपने व्रत का समापन किया।
उसी क्षण एक अद्भुत दृश्य प्रकट हुआ।
आकाश से दिव्य प्रकाश फैल गया। पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवताओं के रथ दिखाई देने लगे। स्वर्ग से गंधर्व और अप्सराएँ उतर आईं।
तभी राजा ने देखा कि एक दिव्य विमान आकाश से नीचे उतर रहा है। उस विमान में उनके पिता राजा नृग विराजमान थे। उनका शरीर दिव्य प्रकाश से चमक रहा था। वे पहले से कहीं अधिक तेजस्वी और सुंदर लग रहे थे।
राजा भावुक होकर रो पड़े।
फिर नृग ने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और वह दिव्य विमान के साथ वैकुंठ की ओर प्रस्थान कर गए।
राजा मान्धाता हाथ जोड़कर उन्हें देखते रहे। उनके हृदय में अपार शांति और आनंद भर गया।
उस दिन से राजा ने अपने राज्य में इंदिरा एकादशी के महात्म्य का प्रचार किया। उन्होंने प्रजा को बताया कि यह व्रत केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि पूर्वजों की मुक्ति के लिए भी अत्यंत फलदायी है।
लोग श्रद्धा से इस एकादशी का पालन करने लगे। धीरे-धीरे अनेक परिवारों में पितृदोष समाप्त होने लगे। जिनके जीवन में बाधाएँ थीं, वे दूर होने लगीं। जिनके मन में अशांति थी, उन्हें शांति मिलने लगी।
कहा जाता है कि जो मनुष्य श्रद्धा, विश्वास और सच्चे हृदय से इंदिरा एकादशी का स्मरण करता है, उसके पूर्वज प्रसन्न होते हैं और उसे जीवन में पुण्य, सुख और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
राजा मान्धाता जीवनभर इस व्रत का पालन करते रहे और अंत में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त हुए।
इस प्रकार इंदिरा एकादशी की यह पवित्र कथा हमें यह सिखाती है कि मनुष्य चाहे कितना भी धर्मात्मा क्यों न हो, यदि वह श्रद्धा और भक्ति से भगवान का स्मरण करता है, तो न केवल उसका बल्कि उसके कुल का भी कल्याण होता है।
जो इस कथा को श्रद्धा से सुनता है, पढ़ता है या दूसरों को सुनाता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, पितृ संतुष्ट होते हैं और जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
