🪔 अजा एकादशी व्रत कथा 🪔
1️⃣ 🕉️ मंगलाचरण
2️⃣ 📖 परिचय
3️⃣ 📜 शास्त्रीय आधार
अजा एकादशी का उल्लेख निम्न ग्रंथों में मिलता है —
इन ग्रंथों में कहा गया है —
4️⃣ 🪔 पूजा विधि
🌅 प्रातःकाल की तैयारी
📿 संकल्प मंत्र (भाव सहित):
“मैं अजा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता हेतु कर रहा/रही हूँ।”
🛕 पूजा सामग्री
🙏 पूजन विधि
🕉️ मुख्य मंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
🌙 रात्रि जागरण (यदि संभव हो)
करना अत्यंत पुण्यकारी होता है।
5️⃣ 🌟 व्रत का फल
अजा एकादशी व्रत से मिलने वाले फल —
📖 शास्त्रों में कहा गया है —
यह व्रत हजारों यज्ञों के समान फल देता है।
6️⃣ 📌 व्रत के नियम
व्रत करते समय इन नियमों का पालन आवश्यक है —
🚫 वर्जित कार्य
✅ पालन करने योग्य बातें
🍽️ व्रत के प्रकार
👉 तीन प्रकार होते हैं —
अपनी क्षमता अनुसार व्रत करें 🙏
7️⃣🪔 अजा एकादशी व्रत कथा प्रारंभ 🪔
बहुत प्राचीन समय की बात है। भारतवर्ष की पुण्यभूमि पर एक प्रसिद्ध नगर था, जिसका नाम था हस्तिनापुर। यह नगर अपने वैभव, धर्मनिष्ठ राजाओं, विद्वानों और साधुओं के लिए प्रसिद्ध था। इसी नगर में एक प्रतापी राजा राज्य करता था, जिसका नाम था हरिशचंद्र। वह सत्य, धर्म और न्याय का प्रतीक माना जाता था। उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। प्रजा उसे भगवान के समान मानती थी, क्योंकि वह कभी भी अन्याय नहीं करता था और सत्य के मार्ग से कभी विचलित नहीं होता था।
राजा हरिशचंद्र का जीवन प्रारंभ से ही धर्ममय था। बचपन से ही उसमें सत्य बोलने और वचन निभाने की अद्भुत प्रवृत्ति थी। उसके माता-पिता ने उसे धर्म, नीति और करुणा का संस्कार दिया था। बड़ा होकर वह जब राजा बना, तब भी उसने उसी आदर्श को अपनाया। उसका एक ही सिद्धांत था — चाहे प्राण चले जाएँ, पर सत्य और धर्म न छोड़े जाएँ।
राजा की पत्नी का नाम था शैव्या। वह भी अत्यंत पतिव्रता, धर्मपरायण और करुणामयी स्त्री थी। दोनों के एक पुत्र था, जिसका नाम रोहिताश्व था। यह परिवार सुख, शांति और समृद्धि से परिपूर्ण था। हर कोई समझता था कि इससे अधिक सौभाग्यशाली जीवन किसी का हो ही नहीं सकता।
परंतु संसार में सुख और दुःख दोनों साथ-साथ चलते हैं। जहाँ धर्म और सत्य की परीक्षा होती है, वहीं ईश्वर अपने भक्तों को परखते भी हैं।
इसी समय देवर्षि नारद और महर्षि विश्वामित्र के बीच एक वार्तालाप हुआ। नारद ने हरिशचंद्र के सत्य और धर्म की प्रशंसा करते हुए कहा कि पृथ्वी पर इस समय उससे बड़ा सत्यवादी कोई नहीं है। उसने कहा कि राजा हरिशचंद्र कभी भी अपने वचन से नहीं डिगेगा, चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए।
यह सुनकर विश्वामित्र को संदेह हुआ। उन्होंने सोचा — “क्या सचमुच कोई मनुष्य इतना दृढ़ हो सकता है? क्या वह अपने जीवन, राज्य, परिवार और सम्मान को छोड़कर भी सत्य पर अडिग रह सकता है?”
उन्होंने निश्चय किया कि वे राजा की परीक्षा लेंगे।
एक दिन विश्वामित्र एक ब्राह्मण के वेश में राजा के दरबार में पहुँचे। राजा ने उनका आदर-सत्कार किया और कहा — “हे ब्राह्मणदेव, आज्ञा करें। मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”
विश्वामित्र ने गंभीर स्वर में कहा — “राजन, यदि आप सच में सत्यवादी हैं, तो मुझे दक्षिणा में अपना पूरा राज्य दान कर दें।”
बिना एक क्षण भी सोचे, राजा हरिशचंद्र ने कहा — “हे ब्राह्मणदेव, यदि यही आपकी इच्छा है, तो मैं अपना पूरा राज्य आपको दान करता हूँ।”
यह सुनकर सभी मंत्री और सभासद चकित रह गए। पर राजा अपने वचन पर अडिग रहा।
राज्य दान करने के बाद विश्वामित्र ने फिर कहा — “राजन, अभी दक्षिणा पूरी नहीं हुई है। मुझे गुरुदक्षिणा भी चाहिए।”
राजा ने विनम्रता से पूछा — “कितनी दक्षिणा चाहिए?”
विश्वामित्र ने कहा — “सोने की बड़ी राशि।”
राजा के पास अब कुछ भी नहीं था। फिर भी उसने कहा — “मैं आपको अवश्य दूँगा।”
राजा अपनी पत्नी और पुत्र के साथ राज्य छोड़कर निकल पड़ा। वह नगर-नगर घूमकर धन कमाने का प्रयास करने लगा, परंतु कहीं भी उसे सफलता नहीं मिली। धीरे-धीरे उसकी सारी संपत्ति समाप्त हो गई।
अंततः विवश होकर उसने अपनी पत्नी और पुत्र को एक ब्राह्मण को बेच दिया, ताकि दक्षिणा पूरी कर सके। यह क्षण उसके जीवन का सबसे पीड़ादायक था। शैव्या रोती रही, रोहिताश्व पिता से लिपट गया, पर राजा का हृदय पत्थर बन चुका था — नहीं, पत्थर नहीं, वह सत्य के व्रत से बँधा हुआ था।
आँखों में आँसू होते हुए भी उसने उन्हें विदा कर दिया।
अब राजा अकेला रह गया।
वह काशी नगरी पहुँचा और वहाँ श्मशान में काम करने लगा। वह चांडाल बन गया। उसका कार्य था — शवों का दाह संस्कार कराना और शुल्क लेना। वही राजा, जो कभी सोने के सिंहासन पर बैठता था, अब लाशों के बीच रहता था।
फिर भी उसने कभी धर्म नहीं छोड़ा।
उधर शैव्या अपने पुत्र के साथ जंगल में रहती थी। एक दिन रोहिताश्व को साँप ने काट लिया और उसकी मृत्यु हो गई। शैव्या विलाप करती हुई अपने मृत पुत्र को लेकर श्मशान पहुँची, जहाँ हरिशचंद्र काम करता था।
दोनों एक-दूसरे को पहचान नहीं पाए।
श्मशान में नियम था कि बिना शुल्क के शव का दाह नहीं किया जा सकता।
राजा ने अपनी पत्नी से भी शुल्क माँगा।
शैव्या के पास कुछ नहीं था। उसने अपनी साड़ी का आधा हिस्सा काटकर देने का निश्चय किया।
जब राजा ने वह साड़ी देखी, तब उसे पहचान हो गई। वह फूट-फूट कर रो पड़ा। शैव्या भी पहचान गई।
दोनों अपने दुर्भाग्य पर विलाप करने लगे।
राजा ने कहा — “हे देवी, यह सब मेरे सत्य-व्रत का परिणाम है। मैंने कभी झूठ नहीं बोला, कभी वचन नहीं तोड़ा।”
इतना कहकर वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।
उसी क्षण आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवता प्रकट हुए। विश्वामित्र भी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए।
उन्होंने कहा — “हे राजन, आपकी परीक्षा पूरी हुई। आपने सिद्ध कर दिया कि आप सत्य और धर्म के सच्चे प्रतीक हैं।”
भगवान विष्णु भी वहाँ प्रकट हुए।
उन्होंने राजा से कहा — “हे भक्त, तुमने अपने सत्य और धर्म से हमें प्रसन्न कर लिया है। तुम्हारे सारे कष्ट समाप्त होते हैं।”
भगवान की कृपा से रोहिताश्व जीवित हो गया। शैव्या का दुःख मिट गया। राजा को पुनः राज्य प्राप्त हुआ।
राजा हरिशचंद्र ने हाथ जोड़कर भगवान से कहा — “हे प्रभु, यदि मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझसे कुछ मांगने को कहें।”
भगवान विष्णु ने कहा — “हे राजन, भविष्य में भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी के नाम से जाना जाएगा। जो मनुष्य इस दिन श्रद्धा से व्रत करेगा, वह तुम्हारे समान पापों से मुक्त होगा और मोक्ष को प्राप्त करेगा।”
भगवान ने बताया कि राजा के जीवन में जो भी कष्ट आए, वे पिछले जन्मों के कर्मों के कारण थे, और अजा एकादशी के पुण्य से वे सब नष्ट हो गए।
राजा ने जीवन भर इस एकादशी का महत्त्व बताया।
उसके बाद से यह कथा संसार में प्रसिद्ध हो गई।
कहा जाता है कि जो भी मनुष्य श्रद्धा, विश्वास और भक्ति से अजा एकादशी की यह कथा सुनता या पढ़ता है, उसके जीवन के दुख, पाप, बाधाएँ और संकट धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। उसके मन में सत्य, धर्म और करुणा का भाव जाग्रत होता है। उसका जीवन पवित्र बनता है और अंत में उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
इस प्रकार राजा हरिशचंद्र की यह कथा हमें सिखाती है कि संसार में चाहे कितनी ही कठिन परीक्षा क्यों न आ जाए, यदि मनुष्य सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है, तो अंत में ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।
यही अजा एकादशी की शास्त्रोक्त पावन कथा है।
8️⃣ 🌺 समापन
🌞 अगले दिन (द्वादशी)
🍚 पारण विधि
❗ बिना पारण के व्रत अधूरा माना जाता है।
🌼 समापन प्रार्थना
ॐ शांति: शांति: शांति: 🕉️✨
