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Saturday, 28 September 2019

संतोषी माँ व्रत कथा

संतोषी माँ व्रत कथा

* संतोषी माँ व्रत कथा :- 

श्री रंगपुर नामका एक गांव था । गांव में एक बुढिया रहती थी। उसके सात पुत्र थे । बुढिया ने सबके विवाह करवा दिये  थे । घर में बहुएँ थी और इस कारण से बुढिया का घर हराभरा लगता था। माँ का तो सभी पुत्रों के उपर समान स्नेह होना चाहिए । सब लड़के समान होने चाहिए । मगर इस बुढिया को बडे छ: लडकों पर अधिक स्नेह था । मगर सातवें पर जरा भी स्नेह न रखती थी । सौतेले पुत्र की तरह उसके साथ व्यवहार रखती थी।

जब रसोई तैयार हो जाए तब बुढिया बडे छ: लडकों की पहले भोजन को बिठा देती थी, उनको अच्छा खिलाती थी और उनकी थाली में जो जूठन बचे उसे इकट्ठा करके एक थाली में रखकर छोटे पुत्र को खाने को देती थी छोटे पुत्र गोरधन को इस बात का पता नहीं था, इसलिए उसकी मां जो उसे देती थी, वह आनन्द से खा लेता था । मगर उस छोटे पुत्र की बहू चपल थी। बुढिया के इस प्रकार का भेदभाव उसे मालूम हो गया । उसने यह बहुत दिन तक देखा, फिर उसका मन बडा दुःखी हो गया । यह तो बहुत बुरी बात है ! अपनी कोख के पुत्र के साथ एसा व्यवहार ? एक दिन मौका देखकर उसने उपने पति से वह बात कही अगर मैं एक बात बताऊँ, तो आप मुझ पर गुस्सा तो नहीं करोगे ना  ! नहीं रे, सच्ची बात पर मैं क्रोध करने वाला नहीं, बता क्या बात है

यह आपकी माता आपको हर रोज आपके भाइयों की जूटन खिलाती है । क्या इस बात का आपको पता है ? इस प्रकार भोले स्वभाव के कब तक रहोगे ? जहाँ इस प्रकार भेदभाव हो, वहाँ एक क्षण भी कैसे रह सके? यह बात मैं मान नहीं सकता । अगर ऐसा है, तो कल मैं प्रत्यक्ष दिखाउँगी मां के अवगुणो का पता तब आपको चलेगा दूसरे दिन बुढिया ने छ; बड़े पुत्रों को रसोई घर मे भोजन करने बिठाया, तब वह छोटा पुत्र बगल वाले कमरे में दरवाजे के पीछे छिपकर दरार से रसोईघर में देखने लगा। आज लावसी बनाई थी इसलिये बुढिया ने आग्रह करके छ: पुत्रों को खिलाई । उनके भोजन कर लेने के बाद छ: के भोजन थाल में बचीसुखी चीजें इकठी करके एक थाल में रखी। छोटा पुत्र यह सब देखकर समझ गया कि बहू का कहना सच है । 

अभी मां भोजन के लिए बुलावेगी और अगर यह थाल मेरे आगे रखे तो मुझे खाना नहीं है । ऐसा निर्णय करके वह दूसरे कमरे में चला गया  उसी समय बुढिया ने आवाज दी - बेटा गोरधन ! भोजन के लिये चल, थाली परोस दी !" गोरधन रसोईघर में आया । मां पर क्रोध तो बहुत आया था, मगर मां का मन दुःखी न होवे इसलिये वह गंभीर हो गया। बेटा ! खडा क्यों है ? खाने को बैठ जा ।" बुढिया ने झूठा प्यार बताते हुए कहा ।

मां आज पेट  दुःखता है, इसहिए कुछ खाना नहीं है। ऐसा कहकर गोरदन अपनी बहू गंगा के पास गया और बोला-"तेरी बात सच्ची है । अब इस घर में मुझे रहना नहीं चाहिए । जहां आदर न हो, वहा सुवर्ण का कौर भी निकम्मा है । मैं आज ही वहाँ से किसी भी अन्य स्थान पर नसीब आजमानेको निकल पडूंगा । उसी समय बुढिया ने गंगा को आवाज दी और कहाँ, बहू, बातें कम करो, अभी बहुत दिन हैं. पहले गोबर थाप दो । 

गंगा तुरंत ही घरके पीछे के अहाते में जाकर गोबर थापन लगी। इस ओर वह छोटा लडका गोरधन दूसरे गांव जाने को कपड़े पहनकर तैयार हो गया । घर में किसी दूसरे की अनुमति उसे लेनी न थी क्योंकि सगाई और रिश्तेमें कितनी मिठाश हैं, वह तो उसने देख ली थी। घर के पिछले दरवाजे से वह अहाते में गया और गंगा को उपले थापती रोककर कहा मैं अभी जाता हूं । तू यहां सुखदुख से दिन काटना । जब मैं ठिकाने लगूंगा, तब तुझे लेन को आऊंगाइतना कहते कहते उसकी आंखों में आंसू छलछला आये।

गंगा ने रोते रोते कहा- "आपके बिना मझे चैन न होगा। यहां मुझे दुःख होगा, तो मैं किसके आगे ह्रदय का भार हलका करूंगी ? फिर भी आप खुशी से जाना...मगर जाने के बाद मुझे भूलना नहीं...? गोरखन ने हाथ की उँगली से पान के आकार की स्वर्ण की अँगूठी निकालकर गंगा की उँगुली में पहना दी और बोला, यह मेरी निशानी तेरे पास होगी इससे तुझे अकेलापन नहीं लगेगा। अब तू भी अपनी ओर से निशानी में कुछ दें। यह मेरी निशानी ऐसा कहकर गंगा ने गोबर वाले हाथका निशान गोरधन के कुर्ते के पीछे के भाग पर लगा दिया और गोरधन भारी हदय से वहां से चल निकला । 

दूसरे दिन दुपहर को गोरधन माधवपुर नाम के एक शहर में आ पहुंचा । वहां उसके नौकरी की तलाश की तो एक बनिये सेठ के यहां उसे नौकरी मिल गई। खाना-पीना और रहने का सेठ के यहां था । इससे गोरधन का कोई चित्ता न थी । वह हररोज प्रात:काल सबसे पहले दूकान पर जाता और शाम को सबके पीछे सेठ के घर खाने को जाता था । वह हर एक काम में तथा वहीखात के हिसाब लिखने में भी काबिल था । इसलिए सेठने थोडे ही समय में उसे उपना मुनीम बना दिया और सारी सत्ता उसे सौंप दी।

समय भी पानी के प्रवाह की तरह बहने लगा, इसे अरसे में बनिया सेठ गोरधन की सारी दूकान सौंपकर यात्रा को चल निकला । उसने बहुत धन पैदा किया था, अब वह पुण्य करने को निकल पडा था । सचमुच किया हुआ पुण्य दान ही साथ ही चलता है, पैसा तो साथ आता ही नहीं। इस ओर श्रीरंगपुरमें गोरधन की बहु गंगा दुःख मे डूब गई थी । घरमें उसके पति की गैरहाजिरी थी, इससे बुढिया ने घरका सारा काम उसके सिर पर डाल दिया था। पूरे घर का काम यह करती थी और आटे की भूसी की कच्ची-पकी रोटी और फूटे नारियल के नारेली में पीने का पानी मिलता था । ऐसा कष्ट वह गूंगे मुंह सहती थी।

एक बार गंगा गांव के बाहर के कुएँ पर पानी भर रही थी, उस समय उसने कुछ स्त्रियां हाथ में थाल लिये खड़ी देखी । गंगा यह देखकर समझ गई कि ये सब कोई व्रत करती होगी। वह तो पानी का बेड़ा वहीं छोडकर वहां गई और पूछने लगी, बहन, मुझे लगता है कि तुम कुछ व्रत करती हो । मैं भी व्रत करना चाहती हूं, तो मुझे बताना कि तुम कोनसा व्रत कर रही हो  एक भले स्वभाव वाली स्त्री बोली - बहन, हम संतोषी मां का व्रत कर रही हैं । यह व्रत ऐसा आसान तथा सादा है कि कम खर्चसे गरीब में गरीब स्त्री-पुरुष भी उसे कर सकते हैं। गंगा बोलीबहन, तब तो इस भांति के व्रत की महिमा बडी होगी ? बहन, यह बताना कि यह व्रत करने से क्या लाभ होता है ?भले स्वभाव वाली स्त्री ने कहा- बहन ! इस संतोषी मां के व्रत के प्रभाव की बात अवर्णनीय है

जिसकी जो इच्छा हो, वह संतोषी मां पूर्ण करती है । निर्धन को धन मिलता है, बेकार को काम मिलता है, रोगी का रोग दूर होता है, परिवार की पीड़ा दूर होती है, संतान रहित के घर में पालना बंधता है, कुंवारी कन्या को मन चाहा पति मिलता है, वियोगी स्नेही जन एक दूसरे से मिलते हैं.... इस प्रकार के अनेक लाभ संतोषी माता के व्रत में रहे है  गंगा बोली- बहन ! मेरे पति कई समय से परदेश कमाने गये है, मगर उनकी ओर से कोई समाचार नहीं है । इस लिये मुझे बहुत चिन्ता होती है । बहन, मेरे तो दुःख का अन्त नहीं। व्रत करने से  क्या वो आ मिलेंगे ?

भले स्वभाव वाली स्त्रीने कहा- बहन ! तू भी संतोषी मां का व्रत शुरु कर दें। इससे थोडे ही समय में तेरे पति की ओर से समाचार मिलेंगे और धीरे धीरे तेरा दुःख कम होने लगेगा । गंगा के मन में संतोषी मां का व्रत करने की प्रबल इच्छा हुई । मगर यह व्रत किस प्रकार किया जाय, उसकी विधि का पता उसे न था और संपूर्ण विधि के बिना व्रत फलता नहीं। इससे उसने भले स्वभाव वाली स्त्री से पूछा - बहन, तुम से बातें करके मैंने समय तो बहुत लिया । अब मुझे संतोषी मां के व्रत की विधि बताना । जिससे मैं व्रत का आरंभ कर दूं।भली स्त्री ने कहा, “बहन, यह व्रत घर में या बाहर शांत वातावरण में हो सकता है । कोई भी शुक्रवार से यह व्रत हो सकता है। 

जहां अनुकूलता हो, वहां घी का दीपक जलांकर उसके आगे पानी से भरा कलश रखना और कलश के उपर कटोरी में गुड तथा भुने हुए चने रखना । फिर वहां बैठकर एक चित्तसे संतोषी मां की कथा कहनी या सुननी चाहिए, कथा पूरी होने पर मां की आरती उतारनी चाहिए, उसके बाद कटोरी के गुड-चने प्रसाद के रूप में आस-पास के छोटे-बड़े सबको बांटनी चाहिए । संतोषी मां की भक्ति हर कोई अपनी शक्ति के मुजब कर सकते हैं, तो सवापांच गूड-चने बांटने चाहिये और साधारण स्थिति हो तो सवापांच आने भी बांटे जा सकते है।

गंगा ने बीच में पूछा, “संतोषी मां के व्रत में खास खास क्या ध्यान रखना चाहिए ? भली स्त्री बोली, “भूखा रहकर संतोषी मां की कथा कहनी या सुननी चाहिए, उसके बाद ही भोजन किया जा सकता है। हर शुक्रवार को इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत किया जाए, तो व्रत का फल अवस्य मिलता है संतोषी मां की दया होगी, तो तीन वरस में भी फल मिलता है, तीन महिने में, तीन सप्ताह में भी फल मिलता है और दशा बुरी हो और ग्रह अनुकूल न हो, तो तीन बरस के बाद फल मिलता है । व्रत करने वाले को संतोषी मां सुख-शांति अवश्य देती है। गंगा ने पूछा बहन, अगर मां की कृपा से मनोकामना पूर्ण हो जाय, तो फिर कुछ करना शेष रहता है ?

भली स्त्री ने कहा, "हां बहन, मनोकामना पूर्ण होने पर व्रत का उद्यापन करना भूलना नहीं । उद्यापन में अढाई आटे के सादे खाजे या घी में तली हुई मोमनदार पुडी और जरूरत के मुजब रखी और चने का साग करना चाहिये । यह सब आठ बालकों को बुलाकर खिलाना चाहिये। अगर अपने परिवार के बालक हो, तो अच्छा । वरना पास-पडोस के बालक भी बुलाये जा सकते हैं । उनको भोजन करके दान-दक्षिणा में कुछ नकद न देना मगर वस्त्र या फल देने चाहिये । उनको प्रसन्न करके विदा करना । इस प्रकार इस व्रत का उद्यापन होगा । मगर इतना ध्यान रखना कि उद्यापन के समय रसोईघर में ईमली, कोकम या ऐसी कोई खटाई वाली चीज न डालनी चाहिए । किसी को नीम्ब, अचार या खटाई की चीज खानेको न देनी चाहिये, न खानी चाहिये।

गंगा ने उस भली औरत का आभार माना फिर जल का बेडा लेकर जल्दी से घर गई । उसने संतोषी मां का व्रत करने का पक्का निर्णय कर लिया। छ: दिन के बाद शुक्रवार आया । उस दिन गंगा ने कुछ खाया नहीं, क्योकि आज उसे व्रत करने का था । वह पहले से ही सवा आने का गुड तथा भुने हुए चने मां के प्रसाद के लिये ले आई थी। शाम हुई तो उसने नहा-धोकर साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर अपने कमरे के एक कोने में संतोषी मां के नाम दीपक जलाया और उसके समीप पानी से भरा कलश रखा तथा उस कलश के उपर एक कटोरी रखी और उसमें गुड चने रखे । फिर संतोषी मां की जय बोलकर, उसने मां से विनती की- "हे सतोषी मां ! मेरा दुःख आप जानती है, तो मेरी इच्छा पूर्ण करके मेरा दुःख दूर करना ।"

इस प्रकार विनती के बाद गंगा ने संतोषी मां की आरती उतारी । उसके बाद उसने स्वयं प्रसाद लिया और बाकी प्रसाद बच्चों में बांट दिया। सुबह से उसने खाया न था । उसकी सास ने खाने को दिया था, उसे उसने ढॅक रखा था । वह उसने एक पहर (एकाटाणे)में खाया और फिर काम करने लग गई । आज उसके आनंद का पारावार न था, क्योंकि उसको विश्वास था कि संतोषी मां उसका संकट अवश्य दूर करेगी। गंगा तो हर्ष से पागल हो गई उसका दुःख बहुत था 

फिर भी असर मुंह पर आनंद चमक उठा। तीसरे शुक्रवार को गंगा ने व्रत की पूर्णाहुति की, उस समय माधवपुर से जो आदमी पहले आया था, वह दो सौ रुपये लेकर आया । वे रुपये गोरधन ने गंगा को भेजे थे और यह भी कहलवाया था कि वह स्वयं थोड़े दिनों के बाद श्रीरंगपुर आयेगा। उस दिन गंगाका आनन्द और बढ़ गया । शाम को उसने मां के नाम का दीपक जलाया और मां के गरबे गाकर मां को बहुत याद किया।

मगर गंगा की जिठानियां उसकी ईष्या करने लगी क्योंकि आज गंगा के पति ने दो सौ रुपये मेजे थे। गंगा के रुपये की जरूरत न थी, उसे तो अपने पति के दर्शन करने थे । इसलिये उसने रोज माता जी से प्रार्थना करनी शुरू की, हे माता, जब मेरे पति आयेंगे, तो मैं अन्न खाऊँगी । मुझसे उनका वियोग सहा नहीं जाता। उसी रात को संतोषी मां ने माधवपुर में गंगा के पति गोरधन को स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, बेटा तू यहां खूबन कमाया है और श्रीरंगपुर में तेरी पत्नी दुःख में दिन पसार कर रही है, तुझे याद करके बेचारी दुबली हो गई है

इसलिये सारा व्यापार समेटकर जलदी से वहा पहुंच जा । मां की दया से गोरधन का व्यापार समेटने में बहुत समय न लगा, सारा प्रबन्ध करके वह दूसरे दिन माल-सामान और माया-पूंजी के साथ श्रीरंगपुर जाने को निकला, दो बैलगाडियाँ को जोड़कर निकल हुआ गोरधन दूसरे दिन दुपहर को श्रीरंगपुर की हद मे  आ पहुंचा, वहाँ गंगा उस समय लकडी काटने आई थी । वह लकडी का गट्ठर बांधकर संताषी मां के मंदिर के औसार पर थकान दूर करने बेटी थी।

आज उसके मन में होता था कि जरुर मेर पति आ पहुंचेंगे। उसी समय बैलोंकी धुंध की ध्वनि सुनाई । इसलिये मन्दिर में माता की मूर्ति के आगे जाकर गिटगिडाकर कहने लगी- मां, मेरी धीरज की हद अब आ चुकी है । आज मुझे ऐसा लगता है कि मेरे पति आयेंगे, क्या यह सच है ? जैसे माताकी मूर्ति बोल रही हो, ऐसी गैबी आवाज सुनाई दी बेटी बात सच्ची है, अभी तेरा पति सुख सलामती से बापस, लौटा है और वह तेरे घर जा रहा है । मगर तू घर जाने की उतावली न करना । 

धंटे के बांद तू सिर पर लकडीका गट्टर रखकर घर जाना और आँगन में गट्टर रखकर तेरी सासने कहना कि सासजी रे सासजी ! आज भी रोजकी तरह महा मुसीबत से लकड़ी काट कर लाई हूँ । अब मुझ आटेकी भूसीकी रोटी खाने को दीजिये और नारियल की नारेल में पानी  पीने को  दीजिये । यह सुनकर गंगा उलजनमें पड़ गई कि ऐसा तो सासजीसे कैसे कहा जाय ? तब फिर से गैबी आबाज आई : बेटी ! तू गभराना नहीं, उसमें तेरी भलाई है । ऐसा करने से ही तेरे पति को मालूम होगा कि तुझे कितना कष्ट पड़ता है।"

गंगा तो हर्ष से पागल हो गई क्योंकि मां की संपूर्ण दया उसके ऊपर उतरी थी। उसके बाद वह मां के गरबे तथा भजन गाती हुई वहां पर बैठी रही । देखते देखते घण्टा पसार हो गया और गंगा सिर पर लकडी का गट्ठर रखकर उल्लास से पूर्ण होकर घर जाने के लिए नीकली । इस दरम्यान गोरधन घर पहुंच गया और उसकी मां हरकोर डोसी उसे खिलाने की तैयारीयां कर रही थी, मगर गोरधनको पहले का कड़वा अनुभव याद था, इससे खाने की ना कहकर वह पाट पर गंगा की राह देखते बैठा । बुढ़िया ने तो गोरधन के आगे गंगा के सुख की बात कही थी। 

उसे कुछ दुःख नहीं था, ऐसा कहा था। मगर गोरधन के मानने में यह आता न था क्योंकि संतोषी मां ने स्वप्न में गंगा के दुःख की बात कही थी और इस लिये वह सब समेटकर जल्दी से घर आया था । बुढ़िया को चिन्ता हुई कि अभी गंगा गट्ठर लेकर घर आ पहुंचेगी तो सारी पोल खुल जायगी । इस लिये वह गोरधन को अन्दर दीवान खाने में जाने का आग्रह कर रही थी मगर गोरधन तो वही बैठा रहा जिससे वह जल्दी से गंगा का मुंह देख सके । उसी समय गंगा लकडी का गट्ठर लेकर आ पहुंची । उसकी यह हालत और दुर्बल देह देखकर गोरधन की आँखों में ऑसु आ गये । जैसे वह गंगा न हो ऐसा लगा। गंगाने तो आते ही कहा-सासजी रे सासजी ! आज भी रोज की तरह कष्ट उठाकर लकड़ी काट लाई हूँ । अब मुझे आटे की भूसीकी रोटी खाने को दीजिये और नारेली में पानी पीने को दीजिये ।" यह सुनते ही बुढ़िया की ऐसी स्थिति हो गई कि काटो तो लहू न निकले । 

बहू ने उसकी पोल को खोल दिया था । मगर गोरधन ने कुछ कहा नहीं । यह गंगा को अपने कमरे में ले गया। वहां गंगा ने अपने दुःख की बात कही और यह भी बताया कि वह स्वयं संतोषी मां का व्रत करती है। गोरधन को भी संताषी मां ने स्वप्न में दर्शन दिये थे । आज उसको पूरा भरोसा हो गया था कि मां के व्रत के प्रभाव द्वारा अपना संसार सुखी होगा। जब वह यह विचार करता बैठा था, तब तक गंगा ने कमरे की सफाई कर दी। बुढ़िया के मन में अब भी डर था, इसलिये वह गोरधन के पास आकर कहने लगी : तुम दोनों पहले भोजन तो कर लो  गोरधन ने कहा-हमें भोजन नहीं करना है । आज से हमारी रसोई अलग होगी, इसलिये मां तू हमारी चिंता न करना।"

बुढ़िया अपना-सा मुंह लेकर चली गई । गोरधन बाजार से सारी सामग्री.ले आया । उस दिन कई वर्षों के बाद गोरधन और गंगा ने साथ बैठकर लापसी खाई। गंगा ने भी आज पहली बार भर पेट खाया, दोनों को आज अपार आनन्द हुआ। शाम को गोरधन के छ: भाई कामकाज से घर लौटे तब उन्होंने गोरधन के आने के समाचार सुने । उनको गोरधन मिला और सातों भाईयों ने सुख-दुःख की बहुत सी बातें की। रात को गंगा ने संतोषी मां का दीपक जलाया । प्रार्थना की और गरबा गाया । गोरधन ने यह सब देखा । और गंगा की धार्मिक भावना के लिये इसके मन में आदर पैदा हुआ । दिन पसार होने लगे और शुक्रवार आया । आज गंगा ने संताषी मां के व्रत का उद्यापन रकने का निर्णय किया । इसलिये वह अपनी जिठानियों से कह आई कि आज मां के व्रत का उद्यापन है, इसलिये सब मिलाकर आठ बालकों को भोजन के लिये शाम को भेजना ।"

गंगा की ईर्षालु जिठानियां ऐसा ही अवसर ढूंढ रही थी। वे किसी भी प्रकार से गंगा के व्रत को तोडना चाहती थी और यह काम बच्चों के द्वारा आसानी से हो सकता था । उन सबों ने अपने पुत्रों को समझा दिया कि तुम अपनी चाची के यहां भोजन करने बैठते समय खटाई मांगना और खटाई खाने को न दे तो पैसे मांगना और उन पैसे से खट्टी चीज लेकर खाना । शाम के समय गंगा ने संताषी मां क नाम का घी का दीपक जलाया, प्रणाम किया और भोजन का थाल घरा । उसके बाद लड़कों को खाने को बिठाये । सबकी थाली में खाजा, खीर और शाक परोशा मगर किसी ने भोजन को हाथ न लगाया। गंगा ने कहा, “सब आ गया, अब भोजन करना शुरु कर दो ।

तब सब लडके एक साथ बोल उठे, “ऐसा स्वादहीन भोजन हमारे गले के नीचे नहीं उतरेगा । इसलिये अचार, मुरब्बा, कचूमर या नीबू सी खट्टी चीज खाने को दीजिये । गंगा ने नम्रता से कहा, मां के व्रत के उद्यापन के समय खटाई नहीं खाई जाती, इसलिये तो मैंने रसोई में भी खटाई नहीं डाली । लड़कों ने तो खटाई के लिए जिद की। अगर वह न दे तो एक एक पैसा देने को कहा । भली गंगा ने उनको राजी करने को एक एक पैसा दिया । 

लड़को ने खाया न खाया कि वे पंसारी की दुकान पर दौड गये और इमली खरीद लाये । गंगा के कमरे में ही बैठकर खाने लगे। गंगा इस समय काम करती थी इसलिये उसको पता न चला। लड़के तो खाकर अपनी अपनी मां के पास गये और बताया कि "मां मां, हमने काकी के पास खटाई मांगी तो उन्होंने न दी । फिर पैसा मांगा, तो दिया और हमने ईमली खरीद कर खाई क्या मां, यह बराबर ? गंगा की जिठानीयाँ बहुत आनन्द में आ गई, क्योंकि वे अपने प्रयत्न में सफल हुई थी।

दूसरे दिन प्रात:काल में गंगा के पति को राजा का बुलावा आया । गंगा डर गई कि क्या काम होगा ? उनके उपर कोई दोष तो नहीं चढ़ा होगा ? वह तो मां से प्रार्थना करने बैठ गई । इस दरम्यान गोरधन तैयार होकर राजा के आगे दरबार में गया और प्रणाम करके अदब के साथ खड़ा रहा। गंगा की जिठानियों ने पड़ोस में एसी बात फैलाई कि गंगा के पति ने राज्य की जकात (कर टैक्स) चूकता नहीं की इसलिये उसे शिक्षा करने को बुलाया है । यह सुनकर गंगा का डर बढ़ गया । उसने मां के नाम का दीपक जलाया और प्रार्थना करने लगी कि "हे संतोषी मां । आपके व्रत में या आपके व्रत के उद्यापन में कोई गलती हो गई हो, तो क्षमा करना ।

इस प्रकार उसने बहुत प्रार्थना की तब गैबी आवाज आई, "बेटी ! तूने मेरे व्रत का उद्यापन किया । उस समय तेरी जिठानियों के पुत्रों को खटाई खाने को न दी यह अच्छा किया । मगर तूने उनको पैसे दिये उससे वे इमली ले आये और तेरे कमरे में बैठकर खाई । क्या व्रत का भंग हुआ कि नहींगंगा बोली-भूल हो गई मां ! फिर भी मैं ने जानबूजकर तो ऐसा नहीं किया । मेने भोले स्वभाव से लड़कों को पैसे दिये थे । हे मैया ! अब भूल नहीं करूँगी । हां मेरे पति को राजा का बुलावा आया है वे वहां गये हैं, इससे मुझे फिकर होती हैं, कि वे कब लौटेंगे ? अदृश्य आवाज आई, “बेटी ! तेरी भक्ति सच्ची है। तुम्हारे शत्रु भी दास हो जाएँगे । जो बलवान होंगे, वे निर्बल हो जायेगे ।

इसी तरह राजा भी उसके प्रति रोष नहीं करेगा । मेरे भक्तो को दुःख हो ऐसा होगा ही नहीं।" घन्टे के बाद गोरधन घर आ पहुंचा । राजा ने उसकी चतुराई पर मुग्ध होकर हीरे से जडित अँगूटी भेंट दी थी । और उसकी ऊँगली पर झगमगाती अंगूठी देखकर 'गंगा समझ गई कि शुभ समाचार है । इस बात की खबर सुनकर गंगा की जिठानियां और जलने लगी। फिर से शुक्रवार आया और गंगा ने मां के व्रत का उद्यापन फिर से किया । आज वह पास-पड़ोस के ब्राह्मणों के बालकों को भोजन को बुला लाई और उन सब को अच्छी तरह खिलाकर वस्त्र देकर विदा किये । गंगा की अगर भक्ति और अविचल श्रद्धा देखकर संतोषी मां उसके उपर प्रसन्न हुए, उसको सारा सुख था मगर पुत्र की कमी थी । संतोषी मां ने यह कमी भी दूर कर दी।

गंगा के अच्छे दिन रहे और नव मास के बाद गंगा ने एक स्वरूपवान पुत्र को जन्म दिया । इससे गंगा का पति गोरधन इतना आनन्द में आ गया कि उसने सवा पांच मन के पेडे लाकर गांव में बांटें । सब ने मुंह मीठे किये मगर गंगा की जिठानिया ने स्वयं पेडे न खाये, न लड़कों को खाने दिया । उस दिन सब को गले के नीचे भोजन न उतरा, क्योंकि उनकी देवरानी को पुत्र आया था । सवा महीना होने पर गंगा नहा-धोकर पुत्र को लेकर संताषी मां के मन्दिर को गई । 

वहां पुत्र को मां की मूर्ति के समक्ष छोड़कर कहने लगी, मां, यह आपके व्रत का फल है अब हमें आप आशीर्वाद दीजिए कि हम सब सुख-संतोष में रहे और सदा आपकी भक्ति करते रहें । उस समय अदृश्य आवाज सुनाई दी, बेटी ! आज नहीं। मैं चाहे किसी भी समय वहां आकर तुजे आशीर्वाद दे जाऊँगी। मगर उस समय तू मुझे पहचान ने में भूल न करना । वर्ना तेरा भाग्य ! ध्यान में रखना

गंगा पुत्र को लेकर घर आई । उस दिन से उसने घर के आगन में आने वाले हर एक का ध्यान रखना शुरू किया एक दिन अस्सी वर्ष की उमर की एक बुढ़िया गुड व भुने हुए चने खाती खाती, पोकार करती, उसके घर के आगे आई। उसके मुंह पर मक्खियां भिन्न-भिन्नाती थी और उसके देह से ऐसी बदबू निकलती थी कि सर फट जायें | सब उसे मारकर भगाने लगे और गालियां देने लगे मगर वह बुढ़िया तो घर के आगे ही खड़ी रही। 

इस समय गंगा पुत्र को लेकर खिड़की के पास खडी थी । उसके मन में हुआ कि संतोषी मां ऐसा स्वांग सजकर आई है । इसलिये यह आशीर्वाद लेने को नीचे उतर आई तो उसकी सांस ने घर के किवाड़ बन्द कर दिये । सब को उस आई हुई बुढ़िया का डर लगता था। गंगा जब उलजन में पड़ गई कि अब क्या करना ? फिर वह मजले पर खिड़की के पास आई और संतोषी माँ के भरोषे पर लड़के को नीचे फेकने को हाथ आगे बढाया । इस समय नीचे खडी बुढ़िया ने भी हाथ पसारें और ज्योंही गंगा ने पुत्र को नीचे फेंका, उस बुढ़िया ने झेल लिया ।

साथ ही किवाड़ खुलने की आवाज सुनाई दी । गंगा नीचे उतरकर बुढ़िया के पास गई । वह देखती है कि उस बुढ़िया के आस पास प्रकाश फैला है और पुत्र उसके हाथों में खेल रहा है। बुढ़िया के चरणों में गंगा गिर पड़ी । वह बुढ़िया संतोषी मां स्वयं थी । उन्होंने गंगा को खड़ी करके आशीर्वाद दिये कि तुम्हारा कल्याण हो और जब तक जियो तब तक आनन्द करो इतना कहकर वह बुढ़िया गायब हो गई । 

सब ने यह चमत्कार अपनी आँखों से देखा और फिर वे मन में बहुत पछतावा करने लगें, क्योंकि उन्होंने मां का आशीर्वाद प्राप्त करने का सुवर्ण अवसर गँवा दिया था। बस उसी दिन से सारे गांव में गंगा का आदर बढ़ गया था । घर में भी उसकी जिठानियां तथा सास ने द्वेषभाव छोड़ दिया । वे भी संतोषी मां का व्रत करने लगी । इससे थोड़े ही दिनों में घरभर में शान्ति स्थापित हो गई। संतोषी माताजी के प्रभाव से हरकोर गृहिणी के घर में समृध्दि पुन: आ गई।

हे संतोषी मां ! जिस प्रकार आप गंगा बहू के ऊपर प्रसन्न हुई और आपने उसकी मनोकामना पूर्ण की, उसी प्रकार संतोषी मां के। शुक्रवार को, इस कथा को कहने-सुनने वालों सबों की मनोकामना पूर्ण करना ।


आपकी जय जयकार हो, संतोषी मैया ।
आपकी महिमा अपार है, संतोषी मैया ।


|| भोग लगाने के समयकी आरती ।।

भोग लगाओ मैया संतोषी ।

भोग लगाओ मैया भुवनेश्वरी ॥

भोजन को जलदी आना, संतोषी मैया ।

मैं तो देख रही तुम्हारी राह.... !

मैया जलदी से आना !

खाजा-खीर प्रेमसे बनाया,

चने का शोक अनोखा बनाया,

भैया उमंगसे आना !

भक्त जनों को शुक्रवार प्यारा ।

कथा श्रवण नामस्मरण है प्यारा !

मैया दर्शन देना रे !

संतोषी मैया, जलदी से आना ।


॥ संतोषी माता जी की आरती ॥

जय संतोषी माता जय संतोषी माता। अपने सेवक जन की सुख सम्पति दाता  जय

सुन्दर चीर सुनहरी मां धारण कीन्हों । हीरा पन्ना दमके तन सिंगार लीन्हों जय

गेरू लाल छटा छवि बदन कमल सोहे । मन्द हंसत करूणामयी त्रिभुवनजन मोहे जय

स्वर्ण सिंहासन बैठी चंवर दुरै प्यारे । धूप, दीप, नैवेध, मधुमेवा भोग धरै न्यारे जय

गुड़ अरू चना परमप्रिय तामें संतोष कियो। संतोषी कहलाई भक्तन वैभव दियो जय

शुक्रवार प्रिय मानत आज दिवस सोही। भक्त मण्डली आई कथा कथा सुनत मोसी  जय

मंदिर जगमग ज्योति मंगल ध्वनि छाई। विनय करे हम बालक चरनन सिर नाई  जय

भक्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजे । बहु धन धान्य भरे घर सुख सौभाग्य दिये जय

ध्यान धरो जाने तेरो मनवांछित फल पायो। पूजा कथा श्रवण कर घर आन्नद आयो जय

शरण गहे की लज्जा रखियो जगदम्बे । संकट तू ही निवारे दयामयी माँ अम्बे  जय

संतोषी माँ की आरती जो कोई नर गावे । दि सिद्धि सुख सम्पति जी भरके पावे 

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