Thursday, 24 January 2013

कुंडली और ग्रह दशा (Horoscope and Planet effect)

कुंडली और ग्रह दशा
१. कुंडली और ग्रह दशा :-

आकाश मण्डल में बहुत से ग्रह हैं मगर ज्योतिष शास्त्र में सात ग्रह व दो छाया ग्रहों का ही उल्लेख मिलता है और यही ग्रह हमारे जीवन को जन्म लग्न की स्थितिनुसार फल देते हैं। मान्यता है कि किसी भी जातक का जीवन नव ग्रहों के शुभ और अशुभ फलों के प्रभाव पर ही निर्भर करता है। कुंडली में नव ग्रहों की स्थिति के अनुरूप ही मानव जीवन में आने वाले सुख-दुख, खुशी-गम, सफलता-असफलता देते हैं। क्या वास्तव में सभी ग्रह हमारी राशि के अनुसार फल प्रदान करते हैं?

इस संसार में हरेक वस्तु चाहे वह ग्रह हो, पेड़-पौधे हो, मानव हो, खनिज तत्व हो। सब अपनी-अपनी तरंगों से एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। हम निश्चय रूप से केवल नवग्रहों से ही नहीं संपूर्ण तारामंडल से प्रभावित होते हैं नवग्रह तो ब्रह्मांड का कुछ प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है। तो क्या ये सब हमारे भविष्य को प्रभावित करते हैं, र्निमित करते हैं ?

अगर आपकी शारीरिक-मानसिक क्षमताएं अपनी गलत धारणाओं और आहार-विहार से कमजोर हो गई है तो आप निश्चय ही इससे प्रभावित होते हैं। क्या ग्रहों के प्रभाव से बच सकते हैं ?

हम सभी जानते हैं कि जब हम कमजोर होते हैं तो गर्मी, सर्दी, बरसात, कोलाहल हल्की आवाजें भी हमसे सहन नहीं होती। जब हम मजबूत होते हैं तो इन सब को लंबे समय तक झेल सकते हैं। अगर आप प्राकृतिक आहार-विहार, योग-ध्यान, रेकी, तनाव रहित जीवन से या सकारात्मक धारणाओं से अपने आपको सशक्त रखते हैं तो ग्रहों के कोई भी प्रभाव आपको विचलित नहीं करते आपको पता भी नहीं चलता कि कौन-सा ग्रह कब आया और कब गया, कौन सा मौसम कब आया कब गया, क्योंकि आपके अपने शरीर मन में कोई परिवर्तन नहीं आता।

२. कुंडली और नौकरी के योग :-

पेशे, प्रसिद्धि, बिजली, स्थिति, अधिकार, सम्मान, सफलता, स्थिति, घुटनों, चरित्र, कर्म, जीवन, पिता, वरिष्ठ अधिकारियों, व्यापार में स्वयं और वरिष्ठ अधिकारियों, सफलता के बीच संबंध, पदोन्नति, सरकार से मान्यता राज्य, व्यापार, नौकरी, प्रशासनिक स्तर, मान-सम्मान, सफलता, सार्वजनिक जीवन, घुटने, संसद, विदेश व्यापार, आयात-निर्यात, विद्रोह 

दूसरा हाउस:कारक धन, परिवार, भाषण, दाहिनी आंख, नाखून, जीभ, नाक, दांत, महत्वाकांक्षा, भोजन, कल्पना, धोखाधड़ी आभूषण, कुटुंब, वाणी विचार, धन की बचत, सौभाग्य, लाभ-हानि, आभूषण, दृष्टि, दाहिनी आँख, स्मरण शक्ति, नाक, ठुड्डी, दाँत, कला, सुख, गला, कान, सूर्य :आत्मा, स्वास्थ्य, पिता, शक्ति, रॉयल्टी, सत्ता, शोहरत, नाम, साहस, विरासत, चिकित्सा, प्रतिष्ठा, ताकत, , ज्ञान इच्छाशक्ति, ऊर्जा,सौभाग्य , 

३. फलादेश कैसे करते है :-

 जो ग्रह अपनी उच्च, अपनी या अपने मित्र ग्रह की राशि में हो - शुभ फलदायक होगा। 

 इसके विपरीत नीच राशि में या अपने शत्रु की राशि में ग्रह अशुभफल दायक होगा। 

 जो ग्रह अपनी राशि पर दृष्टि डालता है, वह शुभ फल देता है। 

 त्रिकोण के स्वामी सदा शुभ फल देते हैं। 

 क्रूर भावों (3, 6, 11) के स्वामी सदा अशुभ फल देते हैं। 

 दुष्ट स्थानों (6, 8, 12) में ग्रह अशुभ फल देते हैं। 

 शुभ ग्रह केन्द्र (1, 4, 7, 10) में शुभफल देते हैं, पाप ग्रह केन्द्र में अशुभ फल देते हैं। 

 बुध, राहु और केतु जिस ग्रह के साथ होते हैं, वैसा ही फल देते हैं। 

 सूर्य के निकट ग्रह अस्त हो जाते हैं और अशुभ फल देते हैं। 

 सूर्य के उपाय 

 आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ करे 3 बार सूर्य के सामने 

 ॐ घृणी सूर्याय नमः का कम से कम 108 बार जप कर ले 

 गायत्री का जप कर ले 

 घर की पूर्व दिशा से रौशनी आयेगी तो अच्छा रहेगा । 

 घर में तुलसी का पौधा जरूर लगा दे 

 पिता की सेवा 

 शराब और मांसाहार न खिलाये 

 शिवजी ,पीपल के उपाय। 

 ज्योतिषि को अपनी कुंडली दिखाइए।

४. कुंडली से जाने प्रेम विवाह कब होगा :-

वैलेंटाइन डे को आज का युवा वर्ग प्रेम के इजहार के पर्व के रूप में मनाने लगा है। कुछ प्रेम के इजहार को विवाह में भी बदल लेते हैं। आपके भावी जीवन साथी की जन्म कुंडली में यदि आपके अनुकूल स्थितियां हों तो प्रेम विवाह के बाद दाम्पत्य जीवन पूर्ण सुखी व सफल रहता है और भाग्योन्नति होती है। 

जन्म कुंडली का पंचम भाव प्रणय संबंध और सप्तम भाव विवाह से संबंधित होता है। शुक्र सप्तम भाव का कारक है। अत: जब पंचमेश, सप्तमेश और शुक्र का शुभ संयोग होता है तो दोनों में घनिष्ठ स्नेह होता है। 

दोनों की राशियां एक दूसरे से समसप्तक हों या एक से अधिक ग्रह समसप्तक हों जैसे एक का चंद्रमा लग्न में तथा दूसरे का सप्तम भाव में हो। 

दोनों के शुभ ग्रह समान भाव में हों अर्थात एक की कुंडली में शुभ ग्रह यदि लग्न, पंचम, नवम या केंद्र में हों तथा दूसरे के भी इन्हीं भावों में हों। 

दोनों के लग्नेश और राशि स्वामी एक ही ग्रह हों। जैसे एक की राशि मीन हो और दूसरे की जन्म लग्न मीन होने पर दोनों का राशि स्वामी गुरु होगा। 

दोनों के लग्नेश, राशि स्वामी या सप्तमेश समान भाव में या एक दूसरे के सम-सप्तक होने पर रिश्तों में प्रगाढ़ता प्रदान करेंगे। 

दोनों की कुंडलियों के ग्रहों में समान दृष्टि संबंध हो। जैसे एक के गुरु चंद्र में दृष्टि संबंध हो तो दूसरे की कुंडली में भी यही ग्रह दृष्टि संबंध बनाएं। 

सप्तम एवं नवम भाव में राशि परिवर्तन हो तो शादी के बाद भाग्योदय होता है। सप्तमेश ग्यारहवें या द्वितीय भाव में स्थित हो तथा नवमांश कुंडली में भी सप्तमेश 2, 5 या 11वें भाव में हो तो ऐसी ग्रह स्थिति वाले जीवन साथी से आर्थिक लाभ होता है। 

उपरोक्त ग्रह स्थितियों में से जितनी अधिक ग्रह स्थितियां दोनों की कुंडलियों में पाई जाएंगी, उनमें उतना ही अधिक सामंजस्य होकर गृहस्थ जीवन सुखी रहेगा। 

इसी प्रकार कुछ विषम ग्रह स्थितियां दाम्पत्य जीवन को दुखदायी बना सकती हैं। अत: ऐसी ग्रह स्थितियों में दोनों की कुंडलियों का मिलान कराने के बाद ही विवाह करें। 

शनि, सूर्य, राहु, 12वें भाव का स्वामी (द्वादशेश) तथा राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी (जैसे राहु मीन राशि में हो तो, मीन का स्वामी गुरु राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी होगा) यह पांच ग्रह विच्छेदात्मक प्रवृति के होते हैं। इनमें से किन्हीं दो या अधिक ग्रहों का युति अथवा दृष्टि संबंध जन्म कुंडली के जिस भाव/भाव स्वामी से होता है तो उसे नुकसान पहुंचाते हैं। सप्तम भाव व उसके स्वामी को इन ग्रहों से प्रभावित करने पर दाम्पत्य में कटुता आती है। सप्तमेश जन्म लग्न से 6, 8, 12वें भाव में हो अथवा सप्तम भाव से 2, 6 या 12वें भाव में हो अथवा नीच, शत्रुक्षेत्रीय या अस्त हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव पैदा होगा। 

५. कुंडली और ग्रह दोष :-

बजरंगबली की आराधना से आप खुशियों का वरदान पा सकते हैं। मंगलवार को बजरंगबली की पूजा के लिए बेहद उत्तम माना गया है। इसके साथ ही यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह दोष हो तो बजरंगबली की पूजा से वह भी दूर हो जाता है। बजरंगबली को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के उपाय बताए गए हैं। 

 धन का संचय न हो पा रहा हो अथवा घर में बरकत न हो पा रही हो तो लाल चंदन, लाल गुलाब के फूलों एवं रोली को लाल कपड़े में बांध कर एक सप्ताह के लिए घर पर बने बजरंगबली के मंदिर में रख दें। एक सप्ताह पश्चात उस कपड़े को घर की तथा दुकान की तिजोरी में रख दें। 

 हनुमान चालिसा का पाठ करने से मन को शांति प्राप्त होती है और मानसिक तनाव दूर होता है। 

 ज्योतिष के मतानुसार बजरंगबली के भक्तों को शनि की साढ़सती और ढैय्या में अशुभ प्रभाव नहीं झेलने पड़ते। बजरंगबली का नाम सिमरण करने मात्र से आप जीवन में आ रही तमाम समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। 

 बजरंगबली को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पण करने से वह बहुत प्रसन्न होते हैं और शीघ्र ही अपने भक्तों की इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। 

 मंगलवार के दिन पीपल के पेड़ से 11 पत्ते तोड़ कर उन्हें शुद्ध जल से साफ करें। कुमकुम, अष्टगंध और चंदन मिलाएं। किसी बारीक तीले से श्री राम का नाम उन पत्तों पर लिखें। नाम लिखते समय हनुमान चालिसा का पाठ करें। इसके बाद श्रीराम नाम लिखे हुए इन पत्तों की एक माला बनाएं और बजरंगबली के मंदिर में जाकर बजरंगबली को पहनाएं। ऐसा करने से जीवन में आने वाली समस्त समस्याओं का समाधान होगा। 

६. जन्म कुंडली में बृहस्पति खराब हो :-

महिलाओं का जीवन उनके पति बच्चों और घर -गृहस्थी में सिमटा होता है। जन्म कुंडली में बृहस्पति खराब हो तो वह महिला को स्वार्थी, लोभी और क्रूर विचार धारा की बना देता है। दाम्पत्य जीवन में दुखों का समावेश होता है और संतान की ओर से भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पेट और आंतों के रोग हो जाते हैं। अगर जन्म- कुंडली में बृहस्पति शुभ प्रभाव दे तो महिला धार्मिक, न्याय प्रिय, ज्ञानवान, पति प्रिया और उत्तम संतान वाली होती है। ऐसी महिलाएं विद्वान होने के साथ -साथ बेहद विनम्र भी होती है। 

कुछ कुंडलियों में बृहस्पति शुभ होने पर भी उग्र रूप धारण कर लेता है तो स्त्री में विनम्रता की जगह अहंकार भर जाता है। वह अपने समक्ष सभी को तुच्छ समझती है क्योंकि बृहस्पति के शुभ होने पर उसमें ज्ञान की सीमा नहीं रहती। वह सिर्फ अपनी ही बात पर विश्वास करती है।अपने इसी व्यवहार के कारण वह घर और आस-पास के वातावरण से कटने लगती है और धीरे- धीरे अवसाद की और घिरने लग जाती है क्योंकि उसे खुद ही मालूम नहीं होता की उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है 

यही अहंकार उस में मोटापे का कारण भी बन जाता है। वैसे तो अन्य ग्रहों के अशुभ प्रभाव से भी मोटापा आता है मगर बृहस्पति के अशुभ प्रभाव से मोटापा अलग ही पहचान में आता है यह शरीर में थुल थूला पन अधिक लाता है क्योंकि की बृहस्पति शरीर में मेद कारक भी है तो मोटापा आना स्वाभाविक ही है। 

कमजोर बृहस्पति हो तो पुखराज रत्न धारण किया जा सकता है मगर किसी ज्योतिष की राय ले कर। गुरुवार का व्रत करें, सोने का धारण करें,पीले रंग के वस्त्र पहनें और पीले भोजन का ही सेवन करें। एक चपाती पर एक चुटकी हल्दी लगाकर खाने से भी बृहस्पति अनुकूल होता है। 

उग्र बृहस्पति को शांत करने के लिए बृहस्पति वार का व्रत करना, पीले रंग और पीले रंग के भोजन से परहेज करना चाहिए बल्कि उसका दान करना चाहिए। केले के वृक्ष की पूजा करें और विष्णु भगवान् को केले का भोग लगाएं और छोटे बच्चों, मंदिरों में केले का दान और गाय को केला खिलाना चाहिए। 

अगर दाम्पत्य जीवन कष्टमय हो तो हर बृहस्पति वार को एक चपाती पर आटे की लोई में थोड़ी सी हल्दी ,देसी घी और चने की दाल ( सभी एक चुटकी मात्र ही ) रख कर गाय को खिलाएं। कई बार पति-पत्नी अगल -अलग जगह नौकरी करते हैं और चाह कर भी एक जगह नहीं रह पाते तो पति -पत्नी दोनों को ही बृहस्पति को चपाती पर गुड की डली रख कर गाय को खिलानी चाहिए और सबसे बड़ी बात यह के झूठ से जितना परहेज किया जाय, बुजुर्गों और अपने गुरु,शिक्षकों के प्रति जितना सम्मान किया जायेगा उतना ही बृहस्पति अनुकूल होता जायेगा। 

७. विभिन्न लग्नों के लिए राजयोग ग्रह :-

कुछ ग्रह लग्न कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभ योग बनाते हैं जो व्यक्ति को धन, यश, मान, प्रतिष्ठा सारे सुख देते हैं। 

विभिन्न लग्नों के लिए राजयोगकारी ग्रह निम्न हैं। 

1. मेष लग्न के लिए गुरु राजयोग कारक होता है। 

2. वृषभ और तुला लग्न के लिए शनि राजयोग कारक होता है। 

3. कर्क लग्न और सिंह लग्न के लिए मंगल राजयोग कारक होता है। 

4. मिथुन लग्न के लिए शुक्र अच्छा फल देता है। 

5. वृश्चिक लग्न के लिए चंद्रमा अच्छा फल देता है। 

6. धनु लग्न के लिए मंगल राजयोग कारक है। 

7. मीन लग्न के लिए चंद्रमा व मंगल शुभ फल देते हैं। 

8. मकर लग्न के लिए शुक्र योगकारक होता है। तो कुंभ लग्न के लिए शुक्र और बुध अच्छा फल देते हैं। कन्या लग्न के लिए शुक्र नवमेश होकर अच्छा फल देता है। 

जो ग्रह एक साथ केंद्र व त्रिकोण के अधिपति होते हैं, वे राजयोगकारी होते हैं। ऐसा न होने पर पंचम व नवम के स्वामित्वों की गणना की जाती है। 

यदि कुंडली में ये ग्रह अशुभ स्थानों में हो, नीच के हो, पाप प्रभाव में हो तो उनके लिए उचित उपाय करना चाहिए।

८. ग्रहों का फल देने का समय :-

ग्रह अपनी दशा अन्तर्दशा में तो अपना फल देते ही हैं बल्कि कुछ और भी जीवन में ऐसे मौके आते हैं जब ग्रह अपना पूरा प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर डालते हैं | जितना कुछ मेरे मस्तिष्क में है वह सब तो मैं व्यक्त नहीं कर सकता परन्तु आवश्यक नियम इस प्रकार हैं |जब आप बीमार होते हैं उस समय सूर्य का प्रभाव आपपर होता है | सूर्य यदि अच्छा हो तो बीमारी की अवस्था में भी आपका मनोबल बना रहता है इसके विपरीत यदि सूर्य अच्छा न हो तो जरा सा स्वास्थ्य खराब होने के बाद आपको जीवन से निराशा होने लगती है | इस समय सूर्य का पूर्ण प्रभाव आप पर होता है | 

घर में किसी बच्चे के जन्म के समय हम चंद्रमा के प्रभाव में होते हैं | जीवन में संवेदनशील लम्हों में चन्द्र का प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है | इसके अतिरिक्त जब हम अपने हुनर या कला का प्रदर्शन करते हैं तब चन्द्र हमारे साथ होते हैं | 

चोट लगने पर, सर्जरी या आपरेशन के समय, संघर्ष करते समय और मेहनत करते वक्त मंगल हमारे साथ होता है | उस वक्त किसी अन्य ग्रह की अपेक्षा मंगल का असर सर्वाधिक आप पर रहता है | हाथ की मंगल रेखा या मंगल के फल देने का काल यही होता है | 

जब बोलकर किसी को प्रभावित करने का समय आता है तब बुध का समय होता है | जब आप चालाकी से अपना काम निकालते हैं तो बुध का बलाबल आपकी सहायता करता है | 

जब हम शिक्षा ग्रहण करते है या फिर जब हम शिक्षा देते हैं उस समय गुरु का प्रभाव हमारे जीवन पर होता है | किसी को आशीर्वाद देते समय या किसी को बददुआ देने के समय बृहस्पति ग्रह की कृपा हम पर होती है | इसके अतिरिक्त पुत्र के जन्म के समय या पुत्र के वियोग के समय भी बृहस्पति का पूरा प्रभाव हमारे जीवन पर होता है | 

मनोरंजन के समय शुक्र का प्रभाव होता है | विवाह, वर्षगांठ, मांगलिक उत्सव और सम्भोग के समय शुक्र के फल को हम भोग रहे होते हैं | आनन्द का समय हो या नृत्य का, हर समय शुक्र हमारे साथ होते हैं | यही एकमात्र ऐसा ग्रह है जिसके निर्बल होने पर जीवन एक बोझ के समान लगता है | जीवन से आनन्द ख़त्म हो जाए या जीना मात्र एक मजबूरी बन कर रह जाए तो समझ ले कि शुक्र का बुरा प्रभाव आप पर है | 

शनि का अर्थ ही दुःख है | जिस समय हम दुःख की अवस्था में होते हैं तब शनि का समय समझे | इस काल को छोड़कर सभी काल क्षण भंगुर होते हैं | शनि के काल की अवधि लम्बी होती है | दुःख या शोक के समय, सेवा करते वक्त, कारावास में या जेल में और बुढापे में शनि का प्रभाव सर्वाधिक होता है | 

९. कुंडली में एक प्रकार के ग्रहण दोष :-

ग्रहण दोष दो प्रकार के होते है सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण ! सूर्य ग्रहण का उपाय उस समय किया जाता है जब सूर्य ग्रहण का मध्य काल हो और चन्द्र ग्रहण का उपाय चन्द्र ग्रहण में किया जाता है ! यहाँ मै सूर्य ग्रहण का उपाय बता रहा हूँ जो आप सूर्य ग्रहण के मध्य काल में कर सकते है ! इस उपाय से राहू चन्द्र के घर में चला जाता है और शांत हो जाता है और पिता के सुख और मान सम्मान में वृद्धि करता है ! सरकार की तरफ से लाभ मिलता है और सूर्य का शुभ फल प्राप्त होता है ! 

 यदि लग्न में राहू हो या लग्न में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 100 ग्राम बादाम गिरी और एक सुखा नारीयलबहते पानी में बहाए ! 

 यदि दुसरे भाव में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 200 ग्राम बादाम और दो सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि तीसरे भाव में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 300 ग्राम बादाम गिरी और तीन सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि चौथे भाव में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 400 ग्राम बादाम गिरी और चार सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि पांचवे घर में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 500 ग्राम बादाम गिरी और पांच सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि छटे भाव में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 600 ग्राम बादाम गिरी और ६ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि सातवे भाव में सूर्य और राहू एक साथ बैठे हो तो 700 ग्राम बादाम गिरी और ७ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि आठवे भाव में राहू और सूर्य एक साथ बैठे हो तो 800 ग्राम बादाम गिरी और ८ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि नौवे भाव में सूर्य और राहू एक साथ हो तो 900 ग्राम बादाम गिरी और ९ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि दशवे घर में सूर्य और राहू एक साथ हो तो 1 किलो बादाम गिरी और १० सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

 यदि एकादश भाव में सूर्य और राहू एक साथ हो तो 1100 ग्राम बादाम गिरी और ११ सूखे नारीयल बहते पानी में बहाए ! 

११. बुध देवता की कृपा से पाएं धन-वैभव :-

बुध ग्रह को ग्रहों में राजकुमार की उपाधि दी गई है। बुध ग्रह को भगवान विष्णु का प्रतिनिधि कहा जा सकता है। इसीलिए धन, वैभव आदि का संबंध बुध से है। बुध की दिशा उत्तर है तथा उत्तर दिशा कुबेर का स्थान भी है। बुध से जु़डा सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण धर्म है। अनुकूलनशीलता हर हाल में खुद को ढाल लेना सिर्फ बुध प्रधान व्यक्ति ही कर सकता है। बुध को कई महत्वपूर्ण तथ्यों का कारक ग्रह माना गया है जैसे – वाणी का कारक, बुद्धि का कारक, त्वचा का कारक, मस्तिष्क की तंत्रिका तंत्र का कारक आदि। 

जन्म या वर्ष कुंडली में बुध ग्रह अशुभफलदायी हो तो भगवान विष्णु का ध्यान करके शुक्ल पक्ष के बुधवार को आरंभ करके 9000 की संख्या में बीज मंत्र का जप करना चाहिए। बुध के तांत्रोक्त मंत्र हैं 

 ऊँ ऎं स्त्रीं श्रीं बुधाय नम: 

 ऊँ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम: 

 ऊँ स्त्रीं स्त्रीं बुधाय नम: 

दान योग्य वस्तुएं मूंगी, 5 हरे फल, चीनी, हरे पुष्प, हरी इलायची, कांस्य पत्र, पन्ना सोना, हाथी का दांत, हरी सब्जी, हरा कपड़ा, दक्षिणा सहित दान करें। 

उपाय कुंडली में बुध शुभ होते हुए भी फलकारक न हो तो निम्न उपाय शुभ होंगे- 

1 हरे रंग का पन्ना बुधवार को सोने की अंगुठी में धारण करें। 

2 हरे रंग के वस्त्र पहनें परंतु यदि बुध अशुभ हो तो हरे वस्त्र कदापि न पहनें। 

3 बुधवार को चांदी या कांस्य के गोल टुकड़े को हरे रंग के कपड़े में लपेट कर जेब में रखें या भुजाओं के साथ बांधें। 

यदि बुध अशुभ हो तो 

1 मूंगी साबत के सात दानें, हरा पत्थर, कांसे का गोल चुकड़ा, हरे वस्त्र में लपेट कर बुधवार को चलते पानी में बहाना शुभ होगा। पानी में बहाते समय कम से कम सात बार बीज मंत्र पढ़ें। 

2 हरे रंग के वस्त्र किसी हिजड़े को बुधवार के दिन देना शुभ होता है। 

3 6 इलायची हरे रूमाल में लपेटकर अपने पास रखें तथा इसके पश्चात एक इलायची व तुलसी पत्र का सेवन करना शुभ रहेगा। 

१२. रूठे ग्रहों को मनाने के लिए :-

बेवजह कुत्तों को कष्ट देने से राहु की उग्रता बढऩे लगती है। कुत्तों को भोजन कराने से कुंडली में राहु की नाराजगी कम होती है। आध्यात्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से सम्पूर्ण विश्व कर्म प्रधान है। हमारे शास्त्र भी कर्म बंधन की बात करते हैं। कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस कराई तो तस फलि चाखा, सकल पदार्थ है जग माही, कर्म हीन पर पावत नाहीं। 

पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता है केवल रूप बदल जाता है। इसी प्रकार किया गया कर्म भी कभी निष्फल नहीं होता है। हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। ग्रहों को प्रसन्न करने के लिए उपासना, यज्ञ और रत्न आदि धारण करने का विधान है। हम लोग जड़ की अपेक्षा सीधे जीव से संबंध स्थापित रखें तो ग्रह अतिशीघ्र प्रसन्न हो सकते हैं। 

वेदों में कहा गया है कि 

मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: गुरु देवो भव: अतिथि देवो भव:। 

हमारे शास्त्रों में सूत्र संकेतों के रूप में हैं जिन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए। 

अभिवादन शीलस्य नित्य 

वृद्धोपसेविन:। 

चत्वारि तस्य वर्धते, 

आयुर्विद्या यशो बलं॥ 

अर्थात मात्र प्रणाम करने से, सदाचार के पालन से एवं नित्य वृद्धों की सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल की वृद्धि होती है। भगवान श्रीगणेश अपने माता-पिता में त्रैलोक समाहित मान कर उनका पूजन और प्रदक्षिणा (चक्कर लगाना) करने से प्रथम पूज्यनीय बन गए। यदि हम जीवों के प्रति परोपकार की भावना रखें तो अपनी कुंडली में ग्रहों की रुष्टता को न्यूनतम कर सकते हैं। 

नवग्रह इस चराचर जगत में पदार्थ, वनस्पति, तत्व, पशु-पक्षी इत्यादि में अपना वास रखते हैं। इसी तरह ऋषियों ने पारिवारिक सदस्यों और आसपास के लोगों में भी ग्रहों का प्रतिनिधित्व बताया है। माता-पिता दोनों के संयोग से किसी जातक का जन्म होता है इसलिए सूर्य आत्मा के साथ-साथ पिता का प्रतिनिधित्व करता है और चंद्रमा मन के साथ-साथ मां का प्रतिनिधित्व करता है। 

योग शास्त्र में दाहिने स्वर को सूर्य और बाएं को चंद्रमा कहा गया है। श्वास ही जीवन है और इसको देने वाले सूर्य और चंद्र हैं। योग ने इस श्वास को प्राण कहा है। आजकल ज्योतिष में तरह-तरह के उपाय प्रचलित हैं परन्तु व्यक्ति के आचरण संबंधी और जीव के निकट संबंधियों से जो उपाय शास्त्रों में वर्णित हैं कदाचित वे चलन में नहीं रह गए हैं। 

यदि कुंडली में सूर्य अशुभ स्थिति में हो, नीच का हो, पीड़ित हो तो कर्मविपाक सिद्धांत के अनुसार यह माना जाता है कि पिता रुष्ट रहे होंगे तभी जातक सूर्य की अशुभ स्थिति में जन्म पाता है। सूर्य के इस अनिष्ट परिहार के लिए इस जन्म में जातक को अपने पिता की सेवा करनी चाहिए और प्रात: उनके चरण स्पर्श करे और अन्य सांसारिक क्रियाओं से उन्हें प्रसन्न रखें तो सूर्य अपना अशुभ फल कम कर सकते हैं। 

यदि सूर्य ग्रह रुष्ट हैं तो पिता को प्रसन्न करें, चंद्र रुष्ट है तो माता को प्रसन्न करें, मंगल रुष्ट है तो भाई-बहन को प्रसन्न करें, बुध रुष्ट है तो मामा और बंधुओं को प्रसन्न करें, गुरु रुष्ट है तो गुरुजन और वृद्धों को प्रसन्न करें, शुक्र रुष्ट है तो पत्नी को प्रसन्न करें, शनि रुष्ट है तो दास-दासी को प्रसन्न करें और यदि केतू रुष्ट है तो कुष्ठ रोगी को प्रसन्न करें। ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार यदि हम प्रेम-सत्कार और आदर का भाव रख कर ग्रहों के प्रति व्यवहार करें तो रुष्ट ग्रह की नाराजगी को शांत किया जा सकता है। 

१३. कुंडली में बुध कमजोर हो तो क्या करें :-

 घर में तुलसी का पौधा लगाएं, बुधवार के दिन तुलसी पत्ते को प्रशाद के रूप में ग्रहण करें। 

 बुधवार के दिन हरे रंग की चूडियां हिजड़े को भेंट स्वरूप दें। 

 हरी सब्जी अथवा दाल पकाएं। 

 हरा चारा गाय को खिलाएं। 

 बुधवार के दिन गणेश जी के मंदिर में जाए प्रणाम करने के उपरांत मोदक का भोग लगाएं तथा बच्चों में बांट दें। 

 तोता पालने से बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है। 

 प्रत्येक बुधवार को ॐ बुं बुधाय नम: के जाप की 2 माला करें। 

 पांच बुधवार तक पांच कन्याओं को हरे वस्त्र दान करें। 

 बुधवार के दिन उपहार आदि में बुध से संबंधित वस्तुएं ना लें। 

 प्रति बुधवार गरीबों को हरे मूंग का दान करें। 

 प्रति बुधवार व्रत-उपवास करें। 

 आपकी कुंडली के अनुसार ज्योतिषी से सलाह लेकर बुध का रत्न व पन्ना धारण कर सकते हैं। 

१४. कुंडली और मंगल ग्रह :-

विवाह संबंधों में मंगल दोष प्रमुख व्यवधान होता है और कई बार अज्ञानतावश भी मंगल वाली कुंडली का हौआ बना दिया जाता है और जातक का विवाह हो ही नहीं पाता। मंगल स्वभाव से तामसी और उग्र ग्रह है। यह जिस स्थान पर बैठता है उसका भी नाश करता है जिसे देखता है उसकी भी हानि करता है। केवल मेष व वृश्चिक राशि (स्वग्रही) में होने पर यह हानि नहीं करता। जब कुंडली में मंगल प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान में हो तो पत्रिका मांगलिक मानी जाती है। 

* प्रथम स्थान का मंगल सातवीं दृष्टि से सप्तम को व चतुर्थ दृष्टि से चौथे घर को देखता है। इसकी तामसिक वृत्ति से वैवाहिक जीवन व घर दोनों प्रभावित होते हैं। 

* चतुर्थ मंगल मानसिक संतुलन बिगाड़ता है, गृह सौख्य में बाधा पहुँचाता है, जीवन को संघर्षमय बनाता है। चौथी दृष्टि से यह सप्तम स्थान यानी वैवाहिक जीवन को प्रभावित करता है। 

* सप्तम मंगल जीवनसाथी से मतभेद बनाता है व मतभेद कई बार तलाक तक पहुँच सकते हैं। 

* अष्टम मंगल संतति सुख को प्रभावित करता है। जीवन साथी की आयु कम करता है। 

* द्वादश मंगल विवाह व शैय्या सुख को नष्ट करता है। विवाह से नुकसान व शोक का कारक है। 

 कब नष्ट होता है यह दोष :- 

* मंगल गुरु की शुभ दृष्टि में हो 

* कर्क व सिंह लग्न में (मंगल राजयोगकारक ग्रह है।) 

* उच्च राशि (मकर) में होने पर। 

* स्व राशि का मंगल होने पर 

* शुक्र, गुरु व चंद्र शुभ होने पर भी मंगल की दाहकता कम हो जाती है। 

* पत्रिका मिलान करते समय यदि दूसरे जातक की कुंडली में इन्हीं स्थानों पर मंगल, शनि या राहु हो तो यह दोष कम हो जाता है  
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