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Thursday, 22 February 2018

मन का नियंत्रण

मन का नियंत्रण

* मन का नियंत्रण :-

मन की चंचलता कोई भी कार्य चाहे वह किसी प्रकार का भी क्यों न हो उसको करते समय मन की एकाग्रता की  अत्यन्त आवश्यकता होती है, क्योंकि यह मन बड़ा ही चंचल है । अर्जुन ऐसे धीर वीर ने भी मनः संयम के प्रसंग में गीता में कहा है कि यह मन बड़ा चंचल, बड़ा बलवान्, दृढ़ और मथने वाला है, इसको रोककर स्थिर करना वायु की गति को रोकने के समान अत्यन्त कठिन है। मन को स्वभाव बन्दर की तरह है। बात की बात में वह चारों धाम की यात्रा और सारे भूमंडल की परिक्रमा कर लेता है। यह इतना बलवान् है कि सैकड़ों हाथियों के पाँवों में जंजीर डाल देना, सैकड़ों सिंहों को पिजड़ों में बन्द

कर देना आसान है, परन्तु इस मन को स्थिर करना सरल नहीं है। मन ही ने काशीपति श्री विश्वनाथ की समाधि भंग कर दी थी, विश्वामित्र और अगस्त जैसे तपस्वियों को धराशायी कर दिया था, देवर्षि नारद को मोहनास्त्र से बाँध लिया था और भगवान् रामचन्द्रजी तक को सीताजी के वियोग में ला दिया था। वह सब इन्द्रियों को अपने अधीन करके सारे शरीर में खलबली मचा देता है। इसे लक्ष्मणजी जैसे मति, हनुमान्जी जैसे योद्धा और भीष्म पितामह जैसे महायोगी ही जीत सकते हैं। इसी के निरोध करने को योग कहते हैं। जो इसका निरोध कर सकता है, वही ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है। शास्त्रों और महान् पुरुषों ने इसको स्थिर करने के कई उपाय बतलाए हैं, परन्तु बड़े भाग्य, पुण्य-प्रताप और उपाय से ही मन स्थिर होता है। इसको स्थिर करने के कुछ नियम नीचे लिखे हुए है

* मन को स्थिर करने के उपाय :- 

(१) आप शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, सूर्य या ॐ कोई भी एक नाम लीजिए और उसे सौ तक गिनिए। अब सौ से उलटे लौट कर गिनते हुए एक पर आइए। इस तरह अभ्यास बढ़ाते-बढ़ाते हज़ार तक गिनिए । आप अपने मन को बहुत कुछ शांत पाएँगें। अब दूसरी मंजिल पर चढिए और दो हजार तक गिनिए। इसी प्रकार तीसरी, चौथी, पाँचवीं, छठवीं, सातवीं, आठवीं, नवीं, और दसवीं, मंज़िल तक चढिए और उतरिए

अर्थात् दस हज़ार तक गिनिए। इस साधन से आपको विलक्षण शांति मिलेगी और जप भी होगा।

(२) प्राणायाम करते हुए कुम्भक की क्रिया में जहाँ प्राण रुकेगा। वहाँ मन भी स्थिर होगा। यह निश्चित बात है। मनः साधन की गिनती करते हुए जब आप एक हज़ार तक पहुँचे तब वहीं चुप होकर बैठ जावें। मन को इधर उधर न जाने दें। इसके बाद लौटकर आ जाएँ तब भी चुप होकर मन को भीतर ही रोक रखें और कुछ देर तक हृदय और नाभि चक्र का ध्यान करें। इस अभ्यास से यह मन कुछ दिनों में शांत व स्थिर होगा। साथ ही आपको बड़ा आनन्द व आत्मानुभव होने लगेगा।

(३) पलंग या चारपाई आदि पर बगैर तकिए के सीधे लेट कर बदन व कपड़ों को ढीला कर देना चाहिए। पश्चात् प्राण को उल्टा खींच कर पेट में ले आवें, फिर छाती तक लावें और फिर पेट में नाभि तक घुमावें। ऐसा करने से आपका नाभि सूर्य प्रकाशित होगा, कुछ दिन इस प्रकार करने से व मन को इसी में लगाने से मन को बड़ी शांति व स्थिरता प्राप्त होगी।

(४) किसी मैदान में खड़े होकर शरीर को ढीला छोड़ दो, हाथों को नीचे लटका कर प्राण को आकाश में फेंक दो, फिर प्राण को भीतर खींचते हुए मन से यह काल्पनिक योग करो कि मैं अमुक शक्ति को खींचकर अपने अन्दर ला रहा हूँ। कुछ दिन ऐसा अभ्यास करने पर आप में उस शक्ति का प्रवेश होगा। हमारे पूर्व पुरुष मन और प्राण की शक्तियों से जो चाहते थे, कर सकते थे। पाँच शक्तियों में से मन और प्राण शक्ति का ऊपर वर्णन किया जा चुका है। क्रिया, भावना और बुद्धि शक्तियाँ इन्हीं दो के अन्तर्गत आ जाती हैं। जो लोग इन दो शक्तियों का शोधन कर लेंगे उनको इनके अलौकिक गुणों का स्वयं ही अनुभव होगा।

मन का नियंत्रण और भी दो प्रकार से किया जा सकता है। एक तो उसकी गति का मार्ग परिवर्तन करने से दूसरा उसे गतिहीन कर देने से। वासना और कामना से लिप्त चित्त को वृत्ति कहते हैं। योग सूत्र में वृत्तिहीन अवस्था ही योगाभ्यास का लक्ष्य बतलाया हैं। जहाँ चित्तवृत्ति का निवारण हुआ कि आत्मस्वरूप की प्राप्ति निश्चित ही है। इसलिए पहले यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान द्वारा मन की गति एक तरफ लगाई जा सकती है। यह सब साधन हमें सविकल्प समाधि तक पहुँचाते हैं, निर्विकल्प समाधि इसके परे है।

मनोविज्ञान के अनुसार मन को गतिहीन करना सम्भव नहीं; परन्तु हम उसको एक तरफ़ से रोककर दूसरी ओर अवश्य लगा सकते हैं। मन सदैव कुछ न कुछ करता ही रहता है इसलिए उसे कुछ न कुछ कार्य देते ही रहना चाहिए। इस मनोवैज्ञानिक सत्य के कारण ही भगवान् कृष्ण ने गीता में इसलिए कर्मयोग और भक्तियोग को ही मन को वश में करने के लिए श्रेष्ठ उपाय बतलाया है।

मन को शून्यता में विलीन करना भी सम्भव नहीं। मन जब तक मन के रूप में है। वह गतिशील ही रहेगा। अध्यात्म दृष्टि से मन अविद्या का कार्य है। द्वैत बुद्धि ही अविद्या है इस द्वैत बुद्धि का निवारण ज्ञान से होता है। द्वैत बुद्धि का नाश हो जाने पर मन अपने आप ही विलीन हो जाता है। अर्थात् जब तक हमें अद्वैत तत्त्व का ज्ञान नहीं हो जाता, मन का अवरोध करना उसे काष्ट को लोष्टवत् बनाने की चेष्टा करना है। जब तक शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति नहीं होती मन का इधर उधर दौड़ना स्वाभाविक है। वास्तव में मन की इस दौड़धूप का अन्तिम प्रयोजन आत्मानन्द अथवा ब्रह्मानन्दं प्राप्त करना ही है।

मन सूक्ष्म होकर जिन कारणों को छोड़कर व सांसारिक वासनाओं को त्यागकर परम शुद्ध आत्मतत्त्व की ओर लगना, मन की सत्ता और आत्मा की सत्ता पर बार बार विचार करना, संसार के पदार्थों की असत्ता का दृढ़ निश्चय हो जाना, परमतत्त्व में चित्त का सामान्य रूप से स्थिर होना आदि। बिना उचित उपाय के मन का नियंत्रण करना कठिन है। जो लोग ठीक युक्तियों को छोड़कर दृढ़तापूर्वक मन को जीतना चाहते हैं। उनको अनेक क्लेश व भय प्राप्त होते हैं। मन का निरोध करने की कुछ युक्तियाँ आगे लिखी जाती हैं।

* ज्ञान की प्राप्ति :-

ज्ञान द्वारा मन का निरोध करना आँखें बन्द करने या फूल को मसल देने से भी सरल है। मन की सत्ता ही अज्ञान के कारण है। और वह ज्ञान द्वारा इस प्रकार सरलता से नष्ट की जा सकती है जैसे रस्सी में साँप की सत्ता। जो वस्तु अज्ञानजन्य है वह ज्ञान होने पर यह भलीभाँति निश्चित हो जाता है कि आत्मा के अतिरिक्त और कोई पदार्थ है ही नहीं और मन भी असत् है।।

* संकल्प त्याग :-

संकल्प मन का बन्धन है और संकल्प का त्याग मन की मुक्ति है। संकल्प न रहने पर मन का नाश हो जाता है। संकल्प के शांत हो जाने पर संसार के सब दु:ख मूल सहित नष्ट हो जाते हैं और मुक्ति का उदय हो जाता है।

* अहंभाव :-

अहंभाव के उदय के साथ ही संसार के भ्रम का भी उदय होता है और अहंभाव के क्षीण होने पर उस स्वभाव में स्थिर हो जाता है जिसमें कि निरंतर शान्ति ही शान्ति है। अहंभाव रूपी मेघ के छिन्न भिन्न होने से चिदाकाश के निर्मल हो जाने पर ही आत्मानुभव रूपी सूर्य का प्रचंड प्रकाश होता है और यह भान होने लगता है कि यह सब संसार इंद्रजाल की तरह मिथ्या है, इसलिए इसमें राग रखने से क्या? और द्वेष रखने से क्या? इस प्रकार निरंतर विचार करते रहने से अहंभाव नष्ट हो जाता है। जब यह ज्ञान हो कि मैं ही सारा जगत् हैं और यहाँ पर कोई भी वस्तु त्यागने अथवा प्राप्त करने योग्य नहीं है, चित्त में समता का प्रकाश हो जाता है तब फिर भला अहंभाव कैसे रह सकता है? ।

* असंग भाव :-

जिसके हृदय में संसार की वस्तुओं का संग है वही मनुष्य संसार सागर में डूबा हुआ है और जिसका मन असंग अर्थात् संग से रहित है, वही संसार से मुक्त है। संसार रहित मनुष्य वह है जो न कर्मों के त्याग से प्रसन्न होता है और न कर्मों में अनुरक्त होता है, जो किसी भी कर्म का फल नहीं चाहता और जो सब अवस्थाओं में समान रहता है। यहाँ सब कुछ आत्मा ही है, अतएव किस वस्तु का त्याग करूँ? और किसका ग्रहण? इस भाव का नाम असंग है। जीवनमुक्त दशा में यही अवस्था होती है।

* कर्तृत्व भाव का त्याग :- 

जब स्पन्दात्मक कर्म क्षीण हो जाता है तो मन भी क्षीण हो। जाता है। जिस तरह अग्नि उष्णता की सदा ऐक्यता है वैसे ही मन और कर्म की सदा ऐक्यता है। दोनों में से एक का भी नाश हो जाने से दोनों का ही नाश हो जाता है। कर्म का (बीज) कारण आत्मा के अज्ञान से उत्पन्न हुआ संकल्प है। संकल्प करना ही बन्धन का कारण है, इसलिये उसका त्याग कर देना चाहिए। संवेदन और सम्बन्ध दोनों को छोड़कर वासना रहित शांत होकर रहने का नाम कर्मयोग है

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