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Tuesday, 22 June 2010

पुत्रदा एकादशी और व्रत कथा

पुत्रदा एकादशी और व्रत कथा
पुत्रदा एकादशी
(श्रावण शुक्ल एकादशी)

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है । इसदिन भगवान् जनार्दन की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। भक्तिपूर्वक इस व्रत को करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए ।

* पुत्रदा एकादशी कथा :-

पुलकित मन से भगवान् श्री कृष्ण को नमस्कार करने के बाद धर्मराज युद्धिष्ठिर ने भगवान् कृष्ण से श्रावण के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में जानने की इच्छा जाहिर की इसके उत्तर में में भगवान कृष्ण ने कहा - हे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ! श्रावण शुक्ला एकादशी का नाम पुत्रदा है मैं इसके बारे में एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जिसके पढ़ने या सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

आप ध्यानपूर्वक इस कथा को सनिये -
द्वापर युग के आरम्भ में महिष्मती नगरी में महीजित नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था। उसका बहुत बड़ा राज्य था, परन्तु कोई पुत्र ना होने के कारण महीजित को राज्य सुखदायी नहीं लगता था । पुत्र प्राप्ति के लिये राजा ने अनेक दान, पुण्य, यज्ञ, हवन आदि उपाय किए परन्तु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। वृद्धावस्था । आती हुई देखकर राजा अपनी प्रजा के प्रतिनिधियों और विद्वान ब्राह्मणों को बुला कर कहने लगा- हे प्रियजनों ! मैन इस जन्म में तो कोई पाप नहीं किया। मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है और न ही मैंने कभी देव मन्दिरों, सद- गृहस्थों अथवा ब्राहाणों का धन छीनना है। किसी दूसरे को धरोहर भी मैनें कभी नहीं। ली और न ही प्रजा पर अन्याय पूर्ण कोई कर लगाया है। मै प्रजा का पुत्र के समान पालन करता हूँ तथा ब्राह्मणों और सन्यासियों को भरपूर दान देता हूँ। यद्यिप न्याय की रक्षा के लिये मै अपराधियों को दण्ड देता हूँ, परन्तु कभी किसी से घृणा नहीं की सबको एक समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता रहा हूँ । इस प्रकार धर्म युक्त राज्य करते हुए भी मेरा पुत्र नहीं है। इस कारण मै अत्यन्त दुःख पा रहा हूँ । इसका क्या कारण है ?

राजा महोजित की इस समस्या के निवारण हेतु प्रजा के प्रतिनिधि तथा मंत्रीगण वन में जाकर बड़े-बड़े ऋर्षियों और मुनियों के दर्शन करते हुए, किसी विद्वान तपस्वी की। तलाश में लग गए। एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यन्त वयोवृद्ध, धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परामात्मा में मन लगाये हुए गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के  ज्ञाता महात्मा लोमेश मुनि को देखा । एक कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था लोमेश ऋर्षि की आयु इतनी अधिक थी कि सबने जाकर लोमेश ऋर्षि को प्रणाम किया और उनके सामने बैठ गए। उन्हें देखकर ऋर्षि ने पूछा कि आप किस कारण से आए हैं? आप मुझे अपनी समस्या बताइए, निसंदेह मै आप लोगों का हित करूंगा। उनके ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले - हे महर्षि । यद्यिप आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ है, मगर फिर भी हम अपनी व्यथा कहते है । महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महीजित प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है, परन्तु फिर भी वह पुत्रहीन है। हम लोग उसकी प्रजा है । अपने राजा के दुःख से हम भी दु:खी हैं । हमको पूर्ण विश्वास है कि आपके दर्शन से हमारा यह संकट आवश्य दूर हो जायेगा, क्योंकि महान पुरूषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते है । आप कृपा कर के राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाए।

यह बात सुनकर ऋषि लोमेश ने थोड़ी देर के लिए अपने नेत्र बन्द कर लिए और राजा के पिछले जन्म का वृतान्त ज्ञात कर लिया । लोमेश ऋर्षि ने स्नेहासिक्त वाणी में कहा - है । महानुभावों ! आपका राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने अनेक बुरे कर्म किए। वह एक गांव से दुसरे गांव व्यापार करने के लिए जाया करता था। एक समय ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन मध्यान्ह काल के समय जब कि वह दो दिन का भूखा प्यासा था, एक जलाशय पर जल पीने गया । उस स्थान पर एक तत्काल गौ जल पी रही थी । राजा ने उस प्यासी गौ को जल पीते से हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा । इसी पाप के कारण राजा को निपुत्र होने का दु:ख सहना पड़ा है। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा बना है और प्यासी गौ को जल पीते से हटाने के कारण पुत्रहीनता का दुःख भोगना पड़ा है। सब लोगों ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ ! राजा का यह पाप नष्ट हो आप ऐसा कोई उपाय बताने की कृपा करें । लोमेश मुनि ने उत्तर दिया - श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पवित्रा एकादशी का व्रत और रात्रि को जागरण करें तो अवश्य ही पुत्र की प्राप्ति होगी।

लोमेश ऋर्षि से उपाय जानने के बाद सभी व्यक्ति नगर को वापस लौट आए । जब श्रावण शुक्ला एकादशी आई तो सबने मिलकर ऋर्षि की आज्ञानुसार राजा सहित पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया। इसके पश्चात् द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को दिया गया । उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसवकाल समाप्त होने पर एक बड़ा तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। अन्त में भगवान कृष्ण ने कहा - हे राजन् ! इस श्रावण शुक्ला एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है, अतः सन्तान सुख की इच्छा रखने वाले इस व्रत को आवश्य करें। इसके महात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है ।